शहंशाह आलम की दो कविताएं
गान
जो गाया जा रहा है
बिना लय बिना ताल के
वह आपके समय का नहीं
मेरे समय का गान है
आपके समय का गान
भरा है चकाचौंध से
सुस्वादु वनस्पतियों से
अमृतमय औषधियों से
अप्सराओं के नृत्य से
मृत्यु के पराजय से
मेरे गान में मेरे चेहरे का
बस रुदन है अनंत तक फैल रहा
अनंत-अनंत बार
आपका मुँह चिढ़ाता
आपके गान का
वाक्य-विन्यास बिगाड़ता
जबकि आप मेरे साथ
जो कुछ करते हैं
पूरे अधिकार से करते हैं
सर्वसम्मत
धर्मसम्मत
विधिसम्मत करते हैं
मेरा बलात्कार
मेरी हत्या भी।
●●●
अटूट
दिन अटूट है दिन से
अँधेरा अँधेरे से
जल जल से
चट्टान चट्टान से
जड़ जड़ से
शब्द अटूट है शब्द से
लय लय से
वाक्य वाक्य से
संगत संगत से
दुःख दुःख से
आत्मा अटूट है आत्मा से
समय समय से
संभव संभव से
घास घास से
फल फल से
जैसे तुम अटूट हो मुझ से
मैं तुम से
अपनी छाया को
अपनी काया से मिलाते हुए।
● शहंशाह आलम
जो गाया जा रहा है
बिना लय बिना ताल के
वह आपके समय का नहीं
मेरे समय का गान है
आपके समय का गान
भरा है चकाचौंध से
सुस्वादु वनस्पतियों से
अमृतमय औषधियों से
अप्सराओं के नृत्य से
मृत्यु के पराजय से
मेरे गान में मेरे चेहरे का
बस रुदन है अनंत तक फैल रहा
अनंत-अनंत बार
आपका मुँह चिढ़ाता
आपके गान का
वाक्य-विन्यास बिगाड़ता
जबकि आप मेरे साथ
जो कुछ करते हैं
पूरे अधिकार से करते हैं
सर्वसम्मत
धर्मसम्मत
विधिसम्मत करते हैं
मेरा बलात्कार
मेरी हत्या भी।
●●●
अटूट
दिन अटूट है दिन से
अँधेरा अँधेरे से
जल जल से
चट्टान चट्टान से
जड़ जड़ से
शब्द अटूट है शब्द से
लय लय से
वाक्य वाक्य से
संगत संगत से
दुःख दुःख से
आत्मा अटूट है आत्मा से
समय समय से
संभव संभव से
घास घास से
फल फल से
जैसे तुम अटूट हो मुझ से
मैं तुम से
अपनी छाया को
अपनी काया से मिलाते हुए।
● शहंशाह आलम

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