कहानी : अंधे अंधा ठेलिया...
-शहंशाह आलम/ आज सुबह उठा, तो घर के बाहर का दृश्य-परिदृश्य नया-नया-सा, बदला-बदला-सा लगा। इस बदले हुए का कारण मुझे तब समझ में आया, जब रोज़ सुबह-शाम शराब के नशे में पड़े रहने वाला मो. इस्लाम आज नशे में न होकर तरोताज़ा दिख रहा था। मैंने पत्नी को मो. इस्लाम के इस बदले हुए रंग-ढंग को घर की खिड़की से दिखाया, तो पत्नी ने कहा- 'बिहार में शराबबंदी का असर अब दिखने लगा है। इनके वाल्दैन ने तो इनका नाम मो. इस्लाम रख दिया, मगर इस आदमी में अपने नाम का एक भी गुण कभी नहीं दिखा।' फिर थोड़ा ठहरकर बोलीं- 'फ़ैज़ के पापा, सरकार ने यह अच्छा क़दम उठाया है... कल तक यह आदमी शराब पीकर अपनी बीवी और बच्चों पर सिर्फ़ ज़ुल्म किया करता था... आज कितना शांत-शांत-सा दिख रहा है। मुझे लगता है, इसे शराब कहीं नहीं मिली...!'
'हो सकता है, जो आप कह रही हैं, सच हो...!' मैंने पत्नी से कहा। लेकिन मैं ख़ुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था कि शराबबंदी के बाद भी शराब नहीं मिल रही होगी, इसलिए कि एक चोर, एक हत्यारा, एक बलात्कारी, एक जेबकतरा सख़्ती के बाद भी कोई-न-कोई घटना ज़रूर अंजाम दे डालता है। ऐसे में एक पियक्कड़ अपने लिए पीने का जुगाड़ नहीं कर पाएगा, मुझे भरोसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ यह क्लियर अभी से कर दूँ कि मुझे इस मो. इस्लाम पर तो पूरा भरोसा था कि इसे शराब नहीं मिलेगी, तो यह पीना पूरी तरह छोड़ दे सकता है। हाँ, मुझे यहाँ के पुलिसिया तन्त्र पर भरोसा क़तई नहीं है कि यह तन्त्र शराबबंदी में सहायक सिद्ध होगा, क्योंकि शराब बेचने वालों से हर थाने में जो 'नज़राना' पहुँचा करता है, उस नज़राने को कोई पुलिस वाला क्योंकर छोड़ना चाहेगा... क्या मैं यहाँ पर ग़लत हूँ? ख़ैर, मो. इस्लाम के इस शराब-प्रसंग को फ़िलहाल मैं यहीं छोड़ता हूँ और आपको आगे लिए चलता हूँ। इस बीच आप भी चाय पी-पाकर एकदमे फिट्ट हो लें। मेरी पत्नी तो मेरे हाथों को चाय का प्याला थमाकर घर के दूसरे कामों में भीड़ चुकी हैं। मेरी पत्नी को पता है कि मैं अपने समय का एक अदना कवि हूँ और मेरा काम चाय-भर से चल जाता है। कोई बड़ा कवि या शायर होता, तो शराब की ज़रूरत भी महसूस होती! इसे अजीब विडंबना कहिए कि अपने सत्य वचनोंवाले मुल्क में मुझ जैसे अदना कवियों के लिए चाय तक बाआसानी दस्तयाब नहीं है और बड़े कवियों के घर तो जैसे शराब की नहरें बहती रही हैं!
हाँ, तो साहिबो, आपको हमारे प्रदेश आए हुए निश्चित अरसा हुआ होगा। इस अरसे बीत चुके में आपको स्मरण कराता चलूँ कि पहले आप हमारे प्रदेश इस उम्मीद को लेकर आते थे कि यहाँ दूसरे प्रदेशों की तरह शराब-शबाब और कबाब की खुल्लम-खुल्ला छूट भी है और लूट भी। अगर आप शराब-शबाब और कबाब की उसी खुल्लम-खुल्ला छूट की उम्मीद लिए हमारे प्रदेश के सफ़रनामे के लिए लकदक-चकाचक होकर निकल रहे हैं, तो आपको अभी से होशियार कराता चलूँ कि बुद्ध की इस भूमि पर अब पूर्ण शराबबंदी लागू है! आपने अक्सर गाड़ियों के पीछे लिखा पाया होगा, 'लटकले तो गेले बेटा' यानी गाड़ी के पीछे आप लटककर सफ़र का मन बनाए हुए हैं, तो आप अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सफ़र पर भी जाने को तैयार रहिए। ठीक उसी तरह मैं आपको चेताता चलूँ कि 'पीले कि गेले बेटा' यानी हमारे प्रदेश में अब आप शराब पीएँगे, तो लंबे समय के लिए जेल की यात्रा पर भेजे जा सकते हैं। लेकिन साहिबो, आप डरिए नहीं, न अपना बोझिल करिए, आपके लिए ख़ुशख़बरी भी है, आपको यहाँ शबाब और कबाब की खुली छूट रहेगी! इस पर सरकार की सख़्तियाँ उतनी इसलिए नहीं हैं कि शबाब और कबाब की ज़रूरत सरकारों को पड़ती रही हैं। ऐसा इसलिए साहिबो, क्योंकि सरकार के मुखिया कुँवारे भी, तलाक़शुदा भी, पत्नी रहते हुए पत्नीरहित भी या असमय मर चुकी पत्नी के पति टाइप भी रहते आए हैं। इसलिए आप देखेंगे कि सरकारें रंडियों को देह-व्यापार के लिए लाइसेंस भी देती आई हैं ताकि वे देह-व्यापार की बीमारी सभ्य समाज में खुलकर फैला सकें ताकि आप भी भुजाएँ चार बाआसानी कर सकें। जहाँ तक सींकों पर भुनकर पकाए हुए मांस या मांस की तली हुई टिकिया पर बैन का सवाल है यानी कबाब पर बैन का सवाल है, तो यह बैन अपने देश की किसी भी सरकार के लिए नामुमकिन इसलिए भी है कि तमाम सरकारें अपनी जनता को कबाब ही तो समझती आई हैं...जब चाहा महँगाई की आँच में जनता को भुना और खाया! ऐसे में कबाब पर बैन का मतलब होगा, जनता को महँगाई से आज़ाद करा देना! अभी अचानक यह भी ख़्याल आ रहा है कि देश की सरकारें कबाब पर रोक लगा देंगी, तब एक बड़ी मुश्किल यह खड़ी हो जाएगी कि सरकार में जी रहे आला अधिकारी हम-आप पर 'कबाब-होना' यानी 'क्रोध से जल-भुन जाना' किस पर किया करेंगे, इसीलिए आपके प्रदेश की तरह हमारे यहाँ कबाब खाने की खुली छूट है।
हज़रात, आपको मोटे अक्षर में समझाता चलूँ...हालाँकि किसी कथाकार को किसी को कुछ भी समझाने का हक़ क़तई नहीं है, इसलिए कि कथाकार ख़ुद एक नासमझ बंदा होता है...लेकिन चूँकि मैं कथाकार न होकर एक कवि-सरीखा ठहरा, इसलिए आपको समझाते हुए चलना मेरा फ़र्ज़ टाइप कुछ-न-कुछ बनता ज़रूर है, इसलिए आप जितने भी लात-घूँसे चला लें, मैं आपको समझाऊँगा ज़रूर... वैसे भी हर लुच्चा-टुच्चा कवि, कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी को, कुछ-न-कुछ समझाता हुआ पाया जाता रहा है। अपन भी उसी लुच्चेपन का निर्वाह करते हुए आपको समझाना चाहता हूँ कि हमारे प्रदेश आकर सबकुछ पीजियो, सबकुछ खइयो, परन्तु शराब को हाथ मत लगइयो रे बाबा, इसलिए कि हमारे प्रदेश के मुखिया को 'शराबबंदी का नशा' सिर चढ़कर बोल रहा है। श्रीमन्, शराबबंदी का नशा एक अच्छा नशा है। यहाँ यह भी मत समझ लीजियो कि मैं शराबबंदी के ख़िलाफ़ हूँ। नहीं, भीया! मैं तो शुरू से इसके ख़िलाफ़ रहा हूँ, प्रदेश के मुखिया जी तो आज इसके ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं। 'शराबी होना घर-परिवार को खोना' मेरा मोटा दिमाग़ कहता आया है। फिर शराब इंसान का नहीं, शैतान का पानी है। इसीलिए मैं बार-बार आपको चेता रहा हूँ कि 'शराबी' होने से अच्छा 'कबाबी' होना है! आप शराब पीकर मुझे आज तक नहीं मार पाए! हाँ, किसी दिन कबाब खाता मैं दिख गया, तो आप मेरी हत्या ज़रूर कर देंगे और आपको सज़ा भी नहीं होगी। अधिक संभावना है कि आपको इस अच्छे काम के लिए देश की सरकारें कई-कई सम्मान से नवाज़ें भी। श्रीमन्, अभी पिछले ही दिनों तो दादरी में अख़लाक़ को हमसब ने मारा है! अख़लाक़ के बाद कइयों को मारा-काटा है...कहाँ हुआ आपका या मेरा कुछ...एक ठो झाँटो नै तोड़ पाई सरकार...उलटे मार-काट का यह सिलसिला पूरे देश में चल पड़ा है। भीया, इसीलिए न हम भी आपको समझा रहे हैं, शराबी नहीं, कबाबी बनिए! आपके दोनों हाथों में सरकारी लड्डू है! छी, अब कोई किसी को कुछ खाने-पीने के लिए जान से मारता है भला! अपने यहाँ ऐसा इसलिए है कि आपके-मेरे इस कुकृत्य के लिए हमें सम्मानित जो किया जाने लगा है।
'फ़ैज़ के पापा!'
पत्नी के द्वारा अचानक पुकारे जाने पर मैं ज़रा चौंक गया था- 'क्या हुआ, क्या कोई बात हो गई या कोई काम है?'
'नहीं फ़ैज़ के पापा, न कोई बात नहीं हुई, न कोई काम घर का आपसे करवाना है। मैं तो बस यह पूछना चाह रही हूँ कि आज दफ़्तर नहीं जाना क्या... आप अब तक तैयार नहीं हो रहे... कहाँ खोए हैं आज?' पत्नी ने फिर एक वाजिब सवाल दाग़ा।
'नहा तो लिया है। तुम नाश्ता फटाफट लगाओ, सना के पापा भी आ ही रहे होंगे। आज सना के पापा मेरी स्कूटी से अपने दफ़्तर के लिए चलेंगे। उनका दफ़्तर रास्ते में ही पड़ता है। मैं उन्हें उनके दफ़्तर छोड़ता चला जाऊँगा।'
'ठीक ही सोचा है आपने, अपने पड़ोसी के काम हमें आना ही चाहिए।' पत्नी के कहे पर मैं कुछ कहता, तब तक एक सवाल उसने और कर डाला- 'अच्छा, फ़ैज़ के पापा, दफ़्तर में आप सबके प्रमोशन का क्या हुआ... आप सबसे जुनियर और कम पढ़े-लिखे प्रियदर्शी राकेश जी को तो दो-दो प्रमोशन मिल चुका। आप ही बता रहे थे कि राकेश जी कह रहे हैं कुछ ही दिनों में वे अधिकारी बनने वाले हैं यानी उनके तीसरे प्रमोशन की तैयारी चल रही है...?'
'हम सबका ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना ही तो हमारी संस्था के प्रधान को पच नहीं रहा है बेगम!' मैंने पत्नी को क़रीब बैठने का इशारा करते हुए कहा- 'तुम्हें तो पता ही है कि मैं एक संवैधानिक संस्था में काम करता हूँ, जहाँ संविधान की सबसे अधिक धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। बेगम, आपको मालूम है न कि हम सबने हमारे इंसाफ़ के लिए अपने प्रधान को आवेदन दिया, तो हमारे प्रधान ने हमें नौकरी से निकाल देने की धमकी दे डाली। ऐसे में मेरे सेक्शन के साथी डरकर अपने हक़ की कोई लड़ाई लड़ना ही नहीं चाहते।'
'आप सब चीफ़ मिनिस्टर साहब से क्यों नहीं मिलते, अपने चीफ़ मिनिस्टर साहब तो काफ़ी इंसाफ़पसंद आदमी हैं। अभी शराबबंदी जैसा क़ानून लाकर चीफ़ मिनिस्टर साहब ने नई तवारीख़ लिखी है।' पत्नी का फिर एक झटका। 'बेगम, क्या आपको मालूम नहीं कि चीफ़ मिनिस्टर साहब को हमारी संस्था के प्रधान द्वारा किए जा रहे प्रमोशन के काले धंधे के बारे में एक गोपनीय चिट्ठी लिखी थी। क्या हशर हुआ उस चिट्ठी का। हमारे प्रधान पहले से ज़्यादा प्रमोशन के काले धंधे में भीड़े हैं। हद तो यह है कि अपने एक सजातीय को, जो आठ वर्षों से सस्पेंड चल रहा था, उनका सस्पेंशन भी उठाया, सारे पैसे भी दिए और प्रमोशन भी। हमने उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, तो उलटे हमें हमारे कामों का हिसाब देने की चिठ्ठी थमा दी गई जबकि दफ़्तर में हम सिर्फ़ काम ही करते रहे हैं। बेगम, अन्याय हमारी संस्था के डी एन ए में है। जहाँ तक चीफ़ मिनिस्टर साहब की बात है, वे सिर्फ़ शराबबंदी का ढोल पीटने में अभी इस क़दर लगे हैं कि उन्हें हम जैसों की फ़िक्र कहाँ! चीफ़ मिनिस्टर साहब जितना ईमानदार बनने का स्वाँग करते हैं, उतने ईमानदार होते, तो हम पर हो रहे अन्याय पर कोई ऐक्शन ज़रूर लेते!'
'ख़ैर, फ़ैज़ के पापा! आप सब अपने इंसाफ़ के लिए कोशिश करते रहिए, कामयाबी ज़रूर मिलेगी।' पत्नी ने मेरी हिम्मत बढ़ाते हुए कहा। पत्नी को मालूम नहीं था कि ये नेता कितने बेरहम होते हैं। मैं आगे कुछ कहता कि सना के पापा के मुझे बुलाने की आवाज़ सुनाई दी। मैं उन्हें अपनी स्कूटी पर लादे ऑफ़िस के लिए निकल पड़ा।
मुहल्ले से बाहर निकलने-निकलने को था कि तेज़ बूँदा-बाँदी शुरू हो गई। इन दिनों बारिश का मौसम था। मेरा मानना है कि बारिश का मौसम उस लड़ाकन औरत की तरह होता है, जो अपने शौहर पर बिना आगा-पीछा सोचे बरस पड़ती है। जिस तरह बेचारा शौहर अपनी हिफ़ाज़त के लिए इधर-उधर अपनी लड़ाकन बीवी से बचने के लिए छुपता फिरता है। बारिश के दिनों में हमारी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही हो जाती है। बारिश शुरू हुई नहीं कि रास्ते भर छुपने का ठिकाना ढ़ूँढ़ते फिरो! अब भीया, आपकी तरह वाटर प्रूफ़ बरसाती भी तो नहीं है मेरे पास! है भी तो उस निगोड़ी को पहन लेने के बाद भी बारिश में भीगने से बच जाना मुहाल हो जाता है! निगोड़ी मेरी बरसाती है ही ऐसी!
बारिश का रोना-धोना कम हुआ, तो मेरी छहसाला स्कूटी अपनी मंज़िल की तरफ़ फिर से बढ़ चली। सना के पापा पीछे बैठने वाली जगह पर जिस शान से बैठे थे, लगता था मेरी स्कूटी कोई लक्ज़री चार चक्के वाली गाड़ी हो और वे मालिक और मैं ड्राइवर! चलिए, मेरे अब्बा हुज़ूर बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट में ड्राइवर रह चुके थे। लगा अपने अब्बा की तरह आज मैं भी ड्राइवर हो ही गया। मेरी गाड़ी चितकोहरा गोलम्बर के पास पहुँचने-पहुँचने को थी। सना के पापा का मुझे ड्राइवरों वाला तसव्वूर के लिए शुक्रिया अदा करने के बारे में सोच ही रहा था कि मेरे आगे-आगे अपनी पत्नी को बैठाए चल रहा मोटर साइकलसवार अचानक गिरते-गिरते किसी तरह संभला। क्या देखता हूँ कि अचानक दो ट्रेफ़िक पुलिस वाले मोटर साइकलसवार के सामने इस तरह अचानक प्रकट हुए कि मारे घबराहट के बेचारा पत्नी समेत गिरते-गिरते बचा। मोटर साइकलसवार को लग रहा था कि वह अपनी पत्नी को नहीं बल्कि किसी पराईऔरत का अपहरण करके जा रहा हो। आगे मोटर साइकलसवार कुछ और समझ पाता कि दोनों ट्रेफ़िक पुलिस वाले में से एक ने ग़ज़ब की फ़ुर्ती दिखाते हुए मोटरसाइकल की चाभी निकालते हुए कहा, 'गाड़ी का कागज-पत्तर दिखाइए...'
मोटरसाइकल वाला बेचारा हक्का-बक्का हुए जा रहा था। उसने घबराई आवाज़ में कहा- 'हम कोई चोर-उचक्के हैं का जी, जो आप इस तरह अचानक आकर हमरी गाड़ी की चाभी ले लिए?'
दूसरे पुलिस वाले ने मोटरसाइकल वाले भाई को और अधिक डराते हुए कहा- 'गाड़ी का कागज दिखाइये, वरना हज़ार रुपया फाइन लगेगा!' यह पुलिस वाला समझ गया था कि इ बेटा बीवी के साथ है, तो अपनी 'इज्जत' बचाए ख़ातिर दो-चार सौ दे ही देगा। तब तक बारिश की वजह से इधर-उधर छुपकर खड़े कुछ और पुलिस वाले आकर कई मोटरसाइकल वाले को काग़ज़ात दिखाने के नाम पर भीड़ लगा चुके थे। यह भी ज़िद्दी टाइप आदमी था, पुलिस वाले से भीड़ गया कि मेरे पास सभी 'कागज-पत्तर' है, तब पैसा किस बात का देंगे। लेकिन पुलिस तो पुलिस ठहरी, वह भी ठेठ बिहारी, यह तो किसी जेबकतरे की तरह आपके पॉकेट से पैसे मार ले। पुलिस वाले इस चितकोहरा मोड़ पर यही कर रहे थे। वैसे आपको यहाँ फ़ख़्र से बताते चलें कि ट्रेफ़िक पुलिस की यह पॉकेटमारी आपको पटना के हर चौक-चौराहे पर देखने को मिल जाएगी। यहाँ की ट्रेफ़िक पुलिस ज़्यादा कोशिश यही करते हैं कि युवा पीढ़ी इनका शिकार ज़्यादा-से-ज़्यादा बने। यह पीढ़ी पुलिसिया ज़ुल्म का शिकार बाआसानी होती जो रही है। इस बीच कोई चोर, कोई ख़ूनी, कोई बलात्कारी, कोई अपहरणकर्ता बचकर निकल भी जाए, तो इनकी बला से। आप इनके इस ज़ुल्म के बारे में पूछेंगे, तो वे यही कहेंगे कि इन्हें आप सबसे पैसे लूटकर ऊपर पहुँचाने होते हैं। हम सबके ऊपर तो हम सबके अल्लाह मियाँ हैं, जिन्हें हमसे कभी किसी वस्तु या पैसे की ज़रूरत नहीं पड़ी। फिर इनके अल्लाह मियाँ कौन हैं, कैसे हैं, जिनके पास इन्हें पैसे पहुँचाने होते हैं, ये पुलिस वाले ही जानें!
'चलिए, इनसे बचकर निकलिए शमशाद भाई, यह तो इनका रोज़ का धंधा है!... आप चलते रहिए, हमें ऑफ़िस वक़्त पर पहुँचने हैं।' सना के पापा ने मुझे याद दिलाया, तो मैं इन पुलिस वालों को मन ही मन हज़ार गालियाँ देता हुआ दफ़्तर के लिए चल पड़ा। सना के पापा भी इन पुलिस वालों की इन हरक़तों से बेज़ार दिख रहे थे। सना के पापा ने मुझसे कहा भी- 'मालूम नहीं, इन पुलिस वालों का पेट भरता भी है या नहीं! सरकार ने अभी-अभी तो इन सबका वेतन बारह की बजाय तेरह महीने का कर दिया है। वर्दी के पैसे अलग। सुविधाएँ अलग। तब भी इन्हें जब देखो, तो खुलेआम पैसे वसूल रहे हैं! बी एम पी के जवानों को देखो, तो बी एम पी परिसर में बने मंदिर में भजन-प्रात: और भजन-संध्या में लगे दिखते हैं! पूरे प्रदेश में हत्या, चोरी और बलात्कार का ग्राफ़ बढ़ा हुआ है! ये पुलिस वाले क्या इन्हीं कामों के लिए वर्दी पहनने के बाद क़समें खाते रहे हैं?... अभी कुछ ही रोज़ पहले खोजा इमली के नज़दीक एक लड़के का एक्सीडेंट हो गया था, स्थानीय लोगों ने ट्रक तक को जला डाला था। ये पुलिस वाले बजाय हमारी हिफ़ाज़त करने के इसी तरह पैसे वसूलने में लगे थे। क्या इन्हें आमजन को परेशान करने से रोकने के लिए कोई क़ानून नहीं है?'
अब मैं सना के पापा के सवालों का क्या जवाब देता, क्या यह कि इन पुलिस वालों का अल्लाह मियाँ ने पेट इतना बड़ा बनाया है कि इनके पेट में जितना डालो इनका पेट ख़ाली ही रहता है। तभी तो ये बेचारे पुलिस वाले बजाय हमारी सुरक्षा के अपने पेट की सुरक्षा में दिन-रात लगे रहते हैं! सना के पापा को उनके दफ़्तर के क़रीब उतारकर मैं अपने दफ़्तर के लिए निकल पड़ा। बारिश लगभग रुक चुकी थी।
मेरा दफ़्तर किया था, कोई आलीशान महल था, वह भी किसी क्रूर राजा का महल! इसके दरो-दीवार में मुझे इन दिनों क्रूरता ही क्रूरता दिखाई देती थी। इसलिए कि यहाँ भी विधाक, मंत्री, विधान परिषद के सभापति, विधान सभा के अध्यक्ष के साथ-साथ इनके रिश्तेदार कर्मचारियों के ज़ुल्मो-सितम के क़िस्से भरे पड़े थे। ये क़िस्से इसी विधान मंडल परिसर में घूम-फिरकर रह जाते हैं, इसीलिए आपको लगता रहा है कि यह जगह आप सबकी समस्याओं से निजात दिलाने वाली जगह है! जबकि सच्चाई 'दूर का ढोल...' जैसी है। विधान मंडल के इस परिसर में प्रवेश करते ही मुझे कबीर साहब की यह साखी अक्सर याद आ जाती है : जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध / अंधे अंधा ठेलिया, दूनू कूप पड़ंत। कबीर साहब की यह साखी पढ़कर अब आपके मन में यह विचार ज़रूर हिचकोले मार रहा होगा कि मैं जिस संस्था में इतने वर्षों से काम कर रहा हूँ, उस संस्था से ऐसी नफ़रत क्यों?... साहिबो, मेरी यह नफ़रत अपनी संस्था के लिए क़तई नहीं है। मेरी नफ़रत इस संस्था के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों से है। वह भी इसलिए कि शीर्ष पर बैठे हुए लोग इस संस्था के साथ आए दिन बेरहमी से बलात्कार करते हैं और पूरी बेशर्मी से इस संस्था की ऊँची कुर्सी पर बैठकर दाँत भी निपोरते हैं। ऐसा करते हुए उन्हें काफ़ी लुत्फ़ महसूस होता है और नींद भी अच्छी आती है।
ख़ैर, मैं यहाँ के भव्य गेट होता हुआ विधान मंडल परिसर में दाख़िल हुआ, तो नज़ारा और दिन से थोड़ा अलग था! विधायक पुत्र, अधिकारी पुत्र और इन सबके लगुए-भगुए में से बहुत सारे अपनी-अपनी उपस्थिति 'उपस्तिथि पंजी' में दर्ज कर अपने-अपने दूसरे कार्यों को पूरा करने के लिए परिषद परिसर से बाहर निकल रहे थे। इन्हें ऐसा करने की छूट थी। हाज़िरी बनाने के बाद कोई अपनी दुकान के लिए, कोई अपनी ठेकेदारी का विज़नेस संभालने के लिए, कोई किसी कॉलेज में फ़्रेंच भाषा का क्लास लेने, कोई किसी और कार्य को निबटाने के लिए निकल ले निकल ले रहा था। इन्हें ऐसा करने से यहाँ के सेक्रेटरी-डिप्टी सेक्रेटरी कोई रोक नहीं सकते थे। इनके पास लाख-लाख टके की गाड़ियाँ थीं। आपको यह भी स्मरण कराता चलूँ कि जितना वेतन इनका था, मेरा भी था। मेरे पास उधार के पैसे से ख़रीदी स्कूटी भर थी। मालूम नहीं, ये इतना सारा ताम-झाम से भरा जीवन कैसे जी लेते थे! इनमें अपने समय के हारे हुए एक महान साहित्यकार माननीय सदस्य के पी ए यादव गौरी भी थे। पटना के पॉश इलाक़े में इन साहब का करोड़ों का मकान था, लक्ज़री गाड़ी थी। जबकि सरकार का दावा यह था कि आय से अधिक संपत्ति वाले बख़्शे नहीं जाएँगे! अब सरकार ही यहीं से चलती है, तो ऐसे कर्मचारियों पर सरकार की नज़रे-इनायत बनी रहेगी ही!
हाज़िरीन, अभी मैं अपनी स्कूटी लगाता कि एक चमचमाती सफ़ेद रंग की गाड़ी सनसनाती हुई मेरी बग़ल से गुज़री और माननीय सदस्यों की लगाई जाने वाली जगह पर आकर लग गई। जो साहब गाड़ी से उतरे, वे मेरे जैसे ही बिलकुल अदना कर्मचारी राकेश कुमार अमित थे। परन्तु इनके पास मात्र ग्यारह लाख की गाड़ी थी। अब चूँकि ये यहाँ के प्रधान के भतीजे थे, इसलिए इनका जन्मसिद्ध अधिकार था कि इतनी महँगी गाड़ी से दफ़्तर आएँ और इनकी गाड़ी मंत्री-संतरी की गाड़ी की बग़ल में लगे। ये साहब शराबबंदी क़ानून लागू होने के बावजूद नशे में लग रहे थे। अब आप ही बताएँ, यह क़ानून इन जैसों के लिए थोड़े ही न बना है?
'क्या शमशाद साहब, आप आप थोड़ा बुझे-बुझे से लग रहे हैं?' मैंने पलटकर देखा, मेरे ही सेक्शन के मिश्र कुमार अजय थे।
'अजय दा, हमारे इस संवैधानिक दफ़्तर ने हम सबके साथ जो अन्याय किया है, इस अन्याय को सहते हुए कौन ख़ुश रहेगा? हमारी बंचिंग काट ली गई, हमें हमारा प्रमोशन नहीं दिया जा रहा, हमें हमारा हक़ माँगने पर नौकरी से निकाल देने की धमकी दी गई, भाई बैठा मुसाफ़िर को अवैध बहाल, अवैध प्रमोशन प्राप्तकर्ता सिन्हा कुमार विश्वजीत जैसे टुच्चे अधिकारी ने अकारण चाँटा मार दिया, सिन्हा कुमार विश्वजीत की इस हरक़त की मुख़ालफ़त करने पर मुझे यहाँ के कुछ क्रिमनल टाइप कर्मियों द्वारा गालियाँ दी गईं, जान से मारने तक की धमकी दी गई और ऐसे ही लोग यहाँ दनदनाते फिरते दिख रहे हैं, तो आपके चेहरे पर ख़ुशी कैसे रह सकती है?'
'भाई, आप कह तो सही रहे हैं।'
'अजय दा, यहाँ जो भी दिखाई देता है, मुझे ज़िंदा लाशें ही दिखाई देता है, वह भी एकदम नंगी लाशें, जिन्हें यही लगता है कि वे ज़िंदा भी हैं और कपड़ों से उनके तन भी ढँके हुए हैं, जबकि सच में ऐसा नहीं होता!' मुझे ऐसा कहने से रहा नहीं गया।
'यह आपने बिलकुल सही कहा, शमशाद भाई! ये साले नंगी लाशों की ही तरह तो हैं... सबसे बड़ा नंगा सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठा हुआ है, जो अपने भतीजे के लिए सबकुछ कर सकता है, राय रामवचन जैसे माननीय सदस्य के दामाद के लिए सबकुछ कर सकता है, जो लोग अपनी पैरवी उस तक करवा सकता है, उनके लिए सबकुछ कर सकता है... और यहाँ हमारा कोई गॉड फ़ादर नहीं है, तो हमारी ज़रूरी, वाजिब माँगें वह पूरी नहीं करना चाहता... लगता है हम इस संस्था के लिए किसी अछूत सरीखे हो गए ...!' मिश्र कुमार अजय का ग़ुस्सा भी सातवें आसमान पर जा पहुँचा। वे जैसे क्रोध से कबाब हुए जा रहे थे। हालाँकि मेरे यह मित्र अक्सर शांत ही रहा करते थे। सच पूछिए, तो दफ़्तर का माहौल इन दिनों इतना विषाक्त हो गया था कि हम सचमुच अपने को अछूत ही महसूसने लगे थे... शायद उनसे भी बदतर स्थिति इस संवैधानिक संस्था ने हम सबकी कर दी थी! बस हम इस भरोसे यहाँ थे कि इस उच्च सदन की सबसे ऊँची कुर्सी पर सबसे ईमानदार आदमी बैठेगा, तो हमें हमारा हक़ मिल जाएगा।
मेहरबाँ, इन दिनों हर तरफ़ शराबबंदी पर बहसें छिड़ी हुई थीं। अब आपसे क्या छुपाना और कैसा छुपाना! हमारे चीफ़ मिनिस्टर साहब को भी यही लगने लगा है कि यह शराबबंदी ही अगले चुनाव में उन्हें फिर से चीफ़ मिनिस्टर की कुर्सी पर क़ब्ज़ा दिलवाएगी! ज़्यादा मुमकिन है कि इन्हें प्राइम मिनिस्टर की कुर्सी तक भी पहुँचवा दे, इसलिए कि इनमें पी एम बनने का मैटेरियल काफ़ी मात्रा में है! आप सब अख़बार पढ़ते ही होंगे... टी वी भी देखते होंगे। हमारे चीफ़ मिनिस्टर साहब अख़बारों में, टी वी चैनल्स पर काफ़ी उत्साहित हो-होकर आ रहे हैं अपनी शराबबंदी को लेकर! पूरा पुलिस प्रशासन इन दिनों बस इसी नेक काम में लगा हुआ है कि सूबे में हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे संगीन जुर्म होते हैं तो हों, बस शराब कोई पीता दिखाई न दे! चीफ़ मिनिस्टर साहब इन दिनों इन्हीं बातों से ख़ुश होते थे! मैं भी शराबबंदी के इस समय में अपना सीना ताने, गर्व और गौरव के साथ दफ़्तर की सारी चिंताओं को लतियाते-जुतियाते अपने घर वापस लौटा, तो मोहल्ले के माहौल में हंगामा-सा फैला हुआ पाया, पूरी लज़्ज़त के साथ। घर दाख़िल हुआ, तो पत्नी का पुरज़ोर इस्तक़बाल पाकर मन गदगद हो उठा- 'क्या बात है बेगम, आज आप कुछ अलग ही दिखाई दे रही हैं?'
'मज़ाक़ करना छोड़िए फ़ैज़ के पापा, आपको मालूम नहीं, आज मोहल्ले में क्या हुआ?' पत्नी का चेहरा रहस्मयी-सा हो गया था।
'क्या हुआ, बिलआख़िर अली इंसान की बीवी किसी और के मर्द के साथ भाग गई... ऐसा तो एक-न-एक दिन होना ही था!'
'नहीं फ़ैज़ के पापा, बात यह नहीं है...'
'तो बात क्या है, बेगम?' मैंने पत्नी को आगे कुछ कहने से पहले ही टोका।
'ऊँह! आप बात पूरी सुनते ही नहीं!' पत्नी ने ज़रा-सा नाराज़ होते हुए एकदम राज़दाराना अंदाज़ में कहा-' मो. इस्लाम भाई फिर से शराब पीकर आए थे!'
'ऐसा हो ही नहीं सकता, फ़ैज़ की मम्मी!' मैंने पूरे एतेमाद से कहा- 'इतना सख़्त क़ानून अपने बिहार में लागू हो गया है कि शराब कहीं मिल ही नहीं सकती... मो. इस्लाम साहब ने ताड़ी पी ली होगी!'
'नहीं, उन्होंने शराब ही पी रखी थी और पूरे मुहल्ले में कहते फिर रहे थे कि एक शराबी को शराब पीने से कोई रोक नहीं सकता, क़ानून भी नहीं...'
मैंने पत्नी ने आगे क्या कहा, सुने बग़ैर मो. इस्लाम के घर जाना ज़रूरी समझा। उनके घर पहुँचा, तो वे नशे में थे। पत्नी और बच्चे डरे-सहमे एक तरफ़ पड़े थे। मुझे अचानक आया देखकर मो. इस्लाम की बीवी सकुचा गई थीं। मैंने बिना किसी हीला-हवाला के मो. इस्लाम से सवाल किया- 'इस्लाम भाई, सुबह मेरे ऑफ़िस जाने तक आप बिना नशे के आप कितने स्मार्ट लग रहे थे, फिर से शराब आपको कहाँ से मिल गई, किसने पीला दी आपको?'
'हो सकता है, जो आप कह रही हैं, सच हो...!' मैंने पत्नी से कहा। लेकिन मैं ख़ुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था कि शराबबंदी के बाद भी शराब नहीं मिल रही होगी, इसलिए कि एक चोर, एक हत्यारा, एक बलात्कारी, एक जेबकतरा सख़्ती के बाद भी कोई-न-कोई घटना ज़रूर अंजाम दे डालता है। ऐसे में एक पियक्कड़ अपने लिए पीने का जुगाड़ नहीं कर पाएगा, मुझे भरोसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ यह क्लियर अभी से कर दूँ कि मुझे इस मो. इस्लाम पर तो पूरा भरोसा था कि इसे शराब नहीं मिलेगी, तो यह पीना पूरी तरह छोड़ दे सकता है। हाँ, मुझे यहाँ के पुलिसिया तन्त्र पर भरोसा क़तई नहीं है कि यह तन्त्र शराबबंदी में सहायक सिद्ध होगा, क्योंकि शराब बेचने वालों से हर थाने में जो 'नज़राना' पहुँचा करता है, उस नज़राने को कोई पुलिस वाला क्योंकर छोड़ना चाहेगा... क्या मैं यहाँ पर ग़लत हूँ? ख़ैर, मो. इस्लाम के इस शराब-प्रसंग को फ़िलहाल मैं यहीं छोड़ता हूँ और आपको आगे लिए चलता हूँ। इस बीच आप भी चाय पी-पाकर एकदमे फिट्ट हो लें। मेरी पत्नी तो मेरे हाथों को चाय का प्याला थमाकर घर के दूसरे कामों में भीड़ चुकी हैं। मेरी पत्नी को पता है कि मैं अपने समय का एक अदना कवि हूँ और मेरा काम चाय-भर से चल जाता है। कोई बड़ा कवि या शायर होता, तो शराब की ज़रूरत भी महसूस होती! इसे अजीब विडंबना कहिए कि अपने सत्य वचनोंवाले मुल्क में मुझ जैसे अदना कवियों के लिए चाय तक बाआसानी दस्तयाब नहीं है और बड़े कवियों के घर तो जैसे शराब की नहरें बहती रही हैं!
हाँ, तो साहिबो, आपको हमारे प्रदेश आए हुए निश्चित अरसा हुआ होगा। इस अरसे बीत चुके में आपको स्मरण कराता चलूँ कि पहले आप हमारे प्रदेश इस उम्मीद को लेकर आते थे कि यहाँ दूसरे प्रदेशों की तरह शराब-शबाब और कबाब की खुल्लम-खुल्ला छूट भी है और लूट भी। अगर आप शराब-शबाब और कबाब की उसी खुल्लम-खुल्ला छूट की उम्मीद लिए हमारे प्रदेश के सफ़रनामे के लिए लकदक-चकाचक होकर निकल रहे हैं, तो आपको अभी से होशियार कराता चलूँ कि बुद्ध की इस भूमि पर अब पूर्ण शराबबंदी लागू है! आपने अक्सर गाड़ियों के पीछे लिखा पाया होगा, 'लटकले तो गेले बेटा' यानी गाड़ी के पीछे आप लटककर सफ़र का मन बनाए हुए हैं, तो आप अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सफ़र पर भी जाने को तैयार रहिए। ठीक उसी तरह मैं आपको चेताता चलूँ कि 'पीले कि गेले बेटा' यानी हमारे प्रदेश में अब आप शराब पीएँगे, तो लंबे समय के लिए जेल की यात्रा पर भेजे जा सकते हैं। लेकिन साहिबो, आप डरिए नहीं, न अपना बोझिल करिए, आपके लिए ख़ुशख़बरी भी है, आपको यहाँ शबाब और कबाब की खुली छूट रहेगी! इस पर सरकार की सख़्तियाँ उतनी इसलिए नहीं हैं कि शबाब और कबाब की ज़रूरत सरकारों को पड़ती रही हैं। ऐसा इसलिए साहिबो, क्योंकि सरकार के मुखिया कुँवारे भी, तलाक़शुदा भी, पत्नी रहते हुए पत्नीरहित भी या असमय मर चुकी पत्नी के पति टाइप भी रहते आए हैं। इसलिए आप देखेंगे कि सरकारें रंडियों को देह-व्यापार के लिए लाइसेंस भी देती आई हैं ताकि वे देह-व्यापार की बीमारी सभ्य समाज में खुलकर फैला सकें ताकि आप भी भुजाएँ चार बाआसानी कर सकें। जहाँ तक सींकों पर भुनकर पकाए हुए मांस या मांस की तली हुई टिकिया पर बैन का सवाल है यानी कबाब पर बैन का सवाल है, तो यह बैन अपने देश की किसी भी सरकार के लिए नामुमकिन इसलिए भी है कि तमाम सरकारें अपनी जनता को कबाब ही तो समझती आई हैं...जब चाहा महँगाई की आँच में जनता को भुना और खाया! ऐसे में कबाब पर बैन का मतलब होगा, जनता को महँगाई से आज़ाद करा देना! अभी अचानक यह भी ख़्याल आ रहा है कि देश की सरकारें कबाब पर रोक लगा देंगी, तब एक बड़ी मुश्किल यह खड़ी हो जाएगी कि सरकार में जी रहे आला अधिकारी हम-आप पर 'कबाब-होना' यानी 'क्रोध से जल-भुन जाना' किस पर किया करेंगे, इसीलिए आपके प्रदेश की तरह हमारे यहाँ कबाब खाने की खुली छूट है।
हज़रात, आपको मोटे अक्षर में समझाता चलूँ...हालाँकि किसी कथाकार को किसी को कुछ भी समझाने का हक़ क़तई नहीं है, इसलिए कि कथाकार ख़ुद एक नासमझ बंदा होता है...लेकिन चूँकि मैं कथाकार न होकर एक कवि-सरीखा ठहरा, इसलिए आपको समझाते हुए चलना मेरा फ़र्ज़ टाइप कुछ-न-कुछ बनता ज़रूर है, इसलिए आप जितने भी लात-घूँसे चला लें, मैं आपको समझाऊँगा ज़रूर... वैसे भी हर लुच्चा-टुच्चा कवि, कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी को, कुछ-न-कुछ समझाता हुआ पाया जाता रहा है। अपन भी उसी लुच्चेपन का निर्वाह करते हुए आपको समझाना चाहता हूँ कि हमारे प्रदेश आकर सबकुछ पीजियो, सबकुछ खइयो, परन्तु शराब को हाथ मत लगइयो रे बाबा, इसलिए कि हमारे प्रदेश के मुखिया को 'शराबबंदी का नशा' सिर चढ़कर बोल रहा है। श्रीमन्, शराबबंदी का नशा एक अच्छा नशा है। यहाँ यह भी मत समझ लीजियो कि मैं शराबबंदी के ख़िलाफ़ हूँ। नहीं, भीया! मैं तो शुरू से इसके ख़िलाफ़ रहा हूँ, प्रदेश के मुखिया जी तो आज इसके ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं। 'शराबी होना घर-परिवार को खोना' मेरा मोटा दिमाग़ कहता आया है। फिर शराब इंसान का नहीं, शैतान का पानी है। इसीलिए मैं बार-बार आपको चेता रहा हूँ कि 'शराबी' होने से अच्छा 'कबाबी' होना है! आप शराब पीकर मुझे आज तक नहीं मार पाए! हाँ, किसी दिन कबाब खाता मैं दिख गया, तो आप मेरी हत्या ज़रूर कर देंगे और आपको सज़ा भी नहीं होगी। अधिक संभावना है कि आपको इस अच्छे काम के लिए देश की सरकारें कई-कई सम्मान से नवाज़ें भी। श्रीमन्, अभी पिछले ही दिनों तो दादरी में अख़लाक़ को हमसब ने मारा है! अख़लाक़ के बाद कइयों को मारा-काटा है...कहाँ हुआ आपका या मेरा कुछ...एक ठो झाँटो नै तोड़ पाई सरकार...उलटे मार-काट का यह सिलसिला पूरे देश में चल पड़ा है। भीया, इसीलिए न हम भी आपको समझा रहे हैं, शराबी नहीं, कबाबी बनिए! आपके दोनों हाथों में सरकारी लड्डू है! छी, अब कोई किसी को कुछ खाने-पीने के लिए जान से मारता है भला! अपने यहाँ ऐसा इसलिए है कि आपके-मेरे इस कुकृत्य के लिए हमें सम्मानित जो किया जाने लगा है।
'फ़ैज़ के पापा!'
पत्नी के द्वारा अचानक पुकारे जाने पर मैं ज़रा चौंक गया था- 'क्या हुआ, क्या कोई बात हो गई या कोई काम है?'
'नहीं फ़ैज़ के पापा, न कोई बात नहीं हुई, न कोई काम घर का आपसे करवाना है। मैं तो बस यह पूछना चाह रही हूँ कि आज दफ़्तर नहीं जाना क्या... आप अब तक तैयार नहीं हो रहे... कहाँ खोए हैं आज?' पत्नी ने फिर एक वाजिब सवाल दाग़ा।
'नहा तो लिया है। तुम नाश्ता फटाफट लगाओ, सना के पापा भी आ ही रहे होंगे। आज सना के पापा मेरी स्कूटी से अपने दफ़्तर के लिए चलेंगे। उनका दफ़्तर रास्ते में ही पड़ता है। मैं उन्हें उनके दफ़्तर छोड़ता चला जाऊँगा।'
'ठीक ही सोचा है आपने, अपने पड़ोसी के काम हमें आना ही चाहिए।' पत्नी के कहे पर मैं कुछ कहता, तब तक एक सवाल उसने और कर डाला- 'अच्छा, फ़ैज़ के पापा, दफ़्तर में आप सबके प्रमोशन का क्या हुआ... आप सबसे जुनियर और कम पढ़े-लिखे प्रियदर्शी राकेश जी को तो दो-दो प्रमोशन मिल चुका। आप ही बता रहे थे कि राकेश जी कह रहे हैं कुछ ही दिनों में वे अधिकारी बनने वाले हैं यानी उनके तीसरे प्रमोशन की तैयारी चल रही है...?'
'हम सबका ज़्यादा पढ़ा-लिखा होना ही तो हमारी संस्था के प्रधान को पच नहीं रहा है बेगम!' मैंने पत्नी को क़रीब बैठने का इशारा करते हुए कहा- 'तुम्हें तो पता ही है कि मैं एक संवैधानिक संस्था में काम करता हूँ, जहाँ संविधान की सबसे अधिक धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। बेगम, आपको मालूम है न कि हम सबने हमारे इंसाफ़ के लिए अपने प्रधान को आवेदन दिया, तो हमारे प्रधान ने हमें नौकरी से निकाल देने की धमकी दे डाली। ऐसे में मेरे सेक्शन के साथी डरकर अपने हक़ की कोई लड़ाई लड़ना ही नहीं चाहते।'
'आप सब चीफ़ मिनिस्टर साहब से क्यों नहीं मिलते, अपने चीफ़ मिनिस्टर साहब तो काफ़ी इंसाफ़पसंद आदमी हैं। अभी शराबबंदी जैसा क़ानून लाकर चीफ़ मिनिस्टर साहब ने नई तवारीख़ लिखी है।' पत्नी का फिर एक झटका। 'बेगम, क्या आपको मालूम नहीं कि चीफ़ मिनिस्टर साहब को हमारी संस्था के प्रधान द्वारा किए जा रहे प्रमोशन के काले धंधे के बारे में एक गोपनीय चिट्ठी लिखी थी। क्या हशर हुआ उस चिट्ठी का। हमारे प्रधान पहले से ज़्यादा प्रमोशन के काले धंधे में भीड़े हैं। हद तो यह है कि अपने एक सजातीय को, जो आठ वर्षों से सस्पेंड चल रहा था, उनका सस्पेंशन भी उठाया, सारे पैसे भी दिए और प्रमोशन भी। हमने उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, तो उलटे हमें हमारे कामों का हिसाब देने की चिठ्ठी थमा दी गई जबकि दफ़्तर में हम सिर्फ़ काम ही करते रहे हैं। बेगम, अन्याय हमारी संस्था के डी एन ए में है। जहाँ तक चीफ़ मिनिस्टर साहब की बात है, वे सिर्फ़ शराबबंदी का ढोल पीटने में अभी इस क़दर लगे हैं कि उन्हें हम जैसों की फ़िक्र कहाँ! चीफ़ मिनिस्टर साहब जितना ईमानदार बनने का स्वाँग करते हैं, उतने ईमानदार होते, तो हम पर हो रहे अन्याय पर कोई ऐक्शन ज़रूर लेते!'
'ख़ैर, फ़ैज़ के पापा! आप सब अपने इंसाफ़ के लिए कोशिश करते रहिए, कामयाबी ज़रूर मिलेगी।' पत्नी ने मेरी हिम्मत बढ़ाते हुए कहा। पत्नी को मालूम नहीं था कि ये नेता कितने बेरहम होते हैं। मैं आगे कुछ कहता कि सना के पापा के मुझे बुलाने की आवाज़ सुनाई दी। मैं उन्हें अपनी स्कूटी पर लादे ऑफ़िस के लिए निकल पड़ा।
मुहल्ले से बाहर निकलने-निकलने को था कि तेज़ बूँदा-बाँदी शुरू हो गई। इन दिनों बारिश का मौसम था। मेरा मानना है कि बारिश का मौसम उस लड़ाकन औरत की तरह होता है, जो अपने शौहर पर बिना आगा-पीछा सोचे बरस पड़ती है। जिस तरह बेचारा शौहर अपनी हिफ़ाज़त के लिए इधर-उधर अपनी लड़ाकन बीवी से बचने के लिए छुपता फिरता है। बारिश के दिनों में हमारी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही हो जाती है। बारिश शुरू हुई नहीं कि रास्ते भर छुपने का ठिकाना ढ़ूँढ़ते फिरो! अब भीया, आपकी तरह वाटर प्रूफ़ बरसाती भी तो नहीं है मेरे पास! है भी तो उस निगोड़ी को पहन लेने के बाद भी बारिश में भीगने से बच जाना मुहाल हो जाता है! निगोड़ी मेरी बरसाती है ही ऐसी!
बारिश का रोना-धोना कम हुआ, तो मेरी छहसाला स्कूटी अपनी मंज़िल की तरफ़ फिर से बढ़ चली। सना के पापा पीछे बैठने वाली जगह पर जिस शान से बैठे थे, लगता था मेरी स्कूटी कोई लक्ज़री चार चक्के वाली गाड़ी हो और वे मालिक और मैं ड्राइवर! चलिए, मेरे अब्बा हुज़ूर बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट में ड्राइवर रह चुके थे। लगा अपने अब्बा की तरह आज मैं भी ड्राइवर हो ही गया। मेरी गाड़ी चितकोहरा गोलम्बर के पास पहुँचने-पहुँचने को थी। सना के पापा का मुझे ड्राइवरों वाला तसव्वूर के लिए शुक्रिया अदा करने के बारे में सोच ही रहा था कि मेरे आगे-आगे अपनी पत्नी को बैठाए चल रहा मोटर साइकलसवार अचानक गिरते-गिरते किसी तरह संभला। क्या देखता हूँ कि अचानक दो ट्रेफ़िक पुलिस वाले मोटर साइकलसवार के सामने इस तरह अचानक प्रकट हुए कि मारे घबराहट के बेचारा पत्नी समेत गिरते-गिरते बचा। मोटर साइकलसवार को लग रहा था कि वह अपनी पत्नी को नहीं बल्कि किसी पराईऔरत का अपहरण करके जा रहा हो। आगे मोटर साइकलसवार कुछ और समझ पाता कि दोनों ट्रेफ़िक पुलिस वाले में से एक ने ग़ज़ब की फ़ुर्ती दिखाते हुए मोटरसाइकल की चाभी निकालते हुए कहा, 'गाड़ी का कागज-पत्तर दिखाइए...'
मोटरसाइकल वाला बेचारा हक्का-बक्का हुए जा रहा था। उसने घबराई आवाज़ में कहा- 'हम कोई चोर-उचक्के हैं का जी, जो आप इस तरह अचानक आकर हमरी गाड़ी की चाभी ले लिए?'
दूसरे पुलिस वाले ने मोटरसाइकल वाले भाई को और अधिक डराते हुए कहा- 'गाड़ी का कागज दिखाइये, वरना हज़ार रुपया फाइन लगेगा!' यह पुलिस वाला समझ गया था कि इ बेटा बीवी के साथ है, तो अपनी 'इज्जत' बचाए ख़ातिर दो-चार सौ दे ही देगा। तब तक बारिश की वजह से इधर-उधर छुपकर खड़े कुछ और पुलिस वाले आकर कई मोटरसाइकल वाले को काग़ज़ात दिखाने के नाम पर भीड़ लगा चुके थे। यह भी ज़िद्दी टाइप आदमी था, पुलिस वाले से भीड़ गया कि मेरे पास सभी 'कागज-पत्तर' है, तब पैसा किस बात का देंगे। लेकिन पुलिस तो पुलिस ठहरी, वह भी ठेठ बिहारी, यह तो किसी जेबकतरे की तरह आपके पॉकेट से पैसे मार ले। पुलिस वाले इस चितकोहरा मोड़ पर यही कर रहे थे। वैसे आपको यहाँ फ़ख़्र से बताते चलें कि ट्रेफ़िक पुलिस की यह पॉकेटमारी आपको पटना के हर चौक-चौराहे पर देखने को मिल जाएगी। यहाँ की ट्रेफ़िक पुलिस ज़्यादा कोशिश यही करते हैं कि युवा पीढ़ी इनका शिकार ज़्यादा-से-ज़्यादा बने। यह पीढ़ी पुलिसिया ज़ुल्म का शिकार बाआसानी होती जो रही है। इस बीच कोई चोर, कोई ख़ूनी, कोई बलात्कारी, कोई अपहरणकर्ता बचकर निकल भी जाए, तो इनकी बला से। आप इनके इस ज़ुल्म के बारे में पूछेंगे, तो वे यही कहेंगे कि इन्हें आप सबसे पैसे लूटकर ऊपर पहुँचाने होते हैं। हम सबके ऊपर तो हम सबके अल्लाह मियाँ हैं, जिन्हें हमसे कभी किसी वस्तु या पैसे की ज़रूरत नहीं पड़ी। फिर इनके अल्लाह मियाँ कौन हैं, कैसे हैं, जिनके पास इन्हें पैसे पहुँचाने होते हैं, ये पुलिस वाले ही जानें!
'चलिए, इनसे बचकर निकलिए शमशाद भाई, यह तो इनका रोज़ का धंधा है!... आप चलते रहिए, हमें ऑफ़िस वक़्त पर पहुँचने हैं।' सना के पापा ने मुझे याद दिलाया, तो मैं इन पुलिस वालों को मन ही मन हज़ार गालियाँ देता हुआ दफ़्तर के लिए चल पड़ा। सना के पापा भी इन पुलिस वालों की इन हरक़तों से बेज़ार दिख रहे थे। सना के पापा ने मुझसे कहा भी- 'मालूम नहीं, इन पुलिस वालों का पेट भरता भी है या नहीं! सरकार ने अभी-अभी तो इन सबका वेतन बारह की बजाय तेरह महीने का कर दिया है। वर्दी के पैसे अलग। सुविधाएँ अलग। तब भी इन्हें जब देखो, तो खुलेआम पैसे वसूल रहे हैं! बी एम पी के जवानों को देखो, तो बी एम पी परिसर में बने मंदिर में भजन-प्रात: और भजन-संध्या में लगे दिखते हैं! पूरे प्रदेश में हत्या, चोरी और बलात्कार का ग्राफ़ बढ़ा हुआ है! ये पुलिस वाले क्या इन्हीं कामों के लिए वर्दी पहनने के बाद क़समें खाते रहे हैं?... अभी कुछ ही रोज़ पहले खोजा इमली के नज़दीक एक लड़के का एक्सीडेंट हो गया था, स्थानीय लोगों ने ट्रक तक को जला डाला था। ये पुलिस वाले बजाय हमारी हिफ़ाज़त करने के इसी तरह पैसे वसूलने में लगे थे। क्या इन्हें आमजन को परेशान करने से रोकने के लिए कोई क़ानून नहीं है?'
अब मैं सना के पापा के सवालों का क्या जवाब देता, क्या यह कि इन पुलिस वालों का अल्लाह मियाँ ने पेट इतना बड़ा बनाया है कि इनके पेट में जितना डालो इनका पेट ख़ाली ही रहता है। तभी तो ये बेचारे पुलिस वाले बजाय हमारी सुरक्षा के अपने पेट की सुरक्षा में दिन-रात लगे रहते हैं! सना के पापा को उनके दफ़्तर के क़रीब उतारकर मैं अपने दफ़्तर के लिए निकल पड़ा। बारिश लगभग रुक चुकी थी।
मेरा दफ़्तर किया था, कोई आलीशान महल था, वह भी किसी क्रूर राजा का महल! इसके दरो-दीवार में मुझे इन दिनों क्रूरता ही क्रूरता दिखाई देती थी। इसलिए कि यहाँ भी विधाक, मंत्री, विधान परिषद के सभापति, विधान सभा के अध्यक्ष के साथ-साथ इनके रिश्तेदार कर्मचारियों के ज़ुल्मो-सितम के क़िस्से भरे पड़े थे। ये क़िस्से इसी विधान मंडल परिसर में घूम-फिरकर रह जाते हैं, इसीलिए आपको लगता रहा है कि यह जगह आप सबकी समस्याओं से निजात दिलाने वाली जगह है! जबकि सच्चाई 'दूर का ढोल...' जैसी है। विधान मंडल के इस परिसर में प्रवेश करते ही मुझे कबीर साहब की यह साखी अक्सर याद आ जाती है : जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध / अंधे अंधा ठेलिया, दूनू कूप पड़ंत। कबीर साहब की यह साखी पढ़कर अब आपके मन में यह विचार ज़रूर हिचकोले मार रहा होगा कि मैं जिस संस्था में इतने वर्षों से काम कर रहा हूँ, उस संस्था से ऐसी नफ़रत क्यों?... साहिबो, मेरी यह नफ़रत अपनी संस्था के लिए क़तई नहीं है। मेरी नफ़रत इस संस्था के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों से है। वह भी इसलिए कि शीर्ष पर बैठे हुए लोग इस संस्था के साथ आए दिन बेरहमी से बलात्कार करते हैं और पूरी बेशर्मी से इस संस्था की ऊँची कुर्सी पर बैठकर दाँत भी निपोरते हैं। ऐसा करते हुए उन्हें काफ़ी लुत्फ़ महसूस होता है और नींद भी अच्छी आती है।
ख़ैर, मैं यहाँ के भव्य गेट होता हुआ विधान मंडल परिसर में दाख़िल हुआ, तो नज़ारा और दिन से थोड़ा अलग था! विधायक पुत्र, अधिकारी पुत्र और इन सबके लगुए-भगुए में से बहुत सारे अपनी-अपनी उपस्थिति 'उपस्तिथि पंजी' में दर्ज कर अपने-अपने दूसरे कार्यों को पूरा करने के लिए परिषद परिसर से बाहर निकल रहे थे। इन्हें ऐसा करने की छूट थी। हाज़िरी बनाने के बाद कोई अपनी दुकान के लिए, कोई अपनी ठेकेदारी का विज़नेस संभालने के लिए, कोई किसी कॉलेज में फ़्रेंच भाषा का क्लास लेने, कोई किसी और कार्य को निबटाने के लिए निकल ले निकल ले रहा था। इन्हें ऐसा करने से यहाँ के सेक्रेटरी-डिप्टी सेक्रेटरी कोई रोक नहीं सकते थे। इनके पास लाख-लाख टके की गाड़ियाँ थीं। आपको यह भी स्मरण कराता चलूँ कि जितना वेतन इनका था, मेरा भी था। मेरे पास उधार के पैसे से ख़रीदी स्कूटी भर थी। मालूम नहीं, ये इतना सारा ताम-झाम से भरा जीवन कैसे जी लेते थे! इनमें अपने समय के हारे हुए एक महान साहित्यकार माननीय सदस्य के पी ए यादव गौरी भी थे। पटना के पॉश इलाक़े में इन साहब का करोड़ों का मकान था, लक्ज़री गाड़ी थी। जबकि सरकार का दावा यह था कि आय से अधिक संपत्ति वाले बख़्शे नहीं जाएँगे! अब सरकार ही यहीं से चलती है, तो ऐसे कर्मचारियों पर सरकार की नज़रे-इनायत बनी रहेगी ही!
हाज़िरीन, अभी मैं अपनी स्कूटी लगाता कि एक चमचमाती सफ़ेद रंग की गाड़ी सनसनाती हुई मेरी बग़ल से गुज़री और माननीय सदस्यों की लगाई जाने वाली जगह पर आकर लग गई। जो साहब गाड़ी से उतरे, वे मेरे जैसे ही बिलकुल अदना कर्मचारी राकेश कुमार अमित थे। परन्तु इनके पास मात्र ग्यारह लाख की गाड़ी थी। अब चूँकि ये यहाँ के प्रधान के भतीजे थे, इसलिए इनका जन्मसिद्ध अधिकार था कि इतनी महँगी गाड़ी से दफ़्तर आएँ और इनकी गाड़ी मंत्री-संतरी की गाड़ी की बग़ल में लगे। ये साहब शराबबंदी क़ानून लागू होने के बावजूद नशे में लग रहे थे। अब आप ही बताएँ, यह क़ानून इन जैसों के लिए थोड़े ही न बना है?
'क्या शमशाद साहब, आप आप थोड़ा बुझे-बुझे से लग रहे हैं?' मैंने पलटकर देखा, मेरे ही सेक्शन के मिश्र कुमार अजय थे।
'अजय दा, हमारे इस संवैधानिक दफ़्तर ने हम सबके साथ जो अन्याय किया है, इस अन्याय को सहते हुए कौन ख़ुश रहेगा? हमारी बंचिंग काट ली गई, हमें हमारा प्रमोशन नहीं दिया जा रहा, हमें हमारा हक़ माँगने पर नौकरी से निकाल देने की धमकी दी गई, भाई बैठा मुसाफ़िर को अवैध बहाल, अवैध प्रमोशन प्राप्तकर्ता सिन्हा कुमार विश्वजीत जैसे टुच्चे अधिकारी ने अकारण चाँटा मार दिया, सिन्हा कुमार विश्वजीत की इस हरक़त की मुख़ालफ़त करने पर मुझे यहाँ के कुछ क्रिमनल टाइप कर्मियों द्वारा गालियाँ दी गईं, जान से मारने तक की धमकी दी गई और ऐसे ही लोग यहाँ दनदनाते फिरते दिख रहे हैं, तो आपके चेहरे पर ख़ुशी कैसे रह सकती है?'
'भाई, आप कह तो सही रहे हैं।'
'अजय दा, यहाँ जो भी दिखाई देता है, मुझे ज़िंदा लाशें ही दिखाई देता है, वह भी एकदम नंगी लाशें, जिन्हें यही लगता है कि वे ज़िंदा भी हैं और कपड़ों से उनके तन भी ढँके हुए हैं, जबकि सच में ऐसा नहीं होता!' मुझे ऐसा कहने से रहा नहीं गया।
'यह आपने बिलकुल सही कहा, शमशाद भाई! ये साले नंगी लाशों की ही तरह तो हैं... सबसे बड़ा नंगा सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठा हुआ है, जो अपने भतीजे के लिए सबकुछ कर सकता है, राय रामवचन जैसे माननीय सदस्य के दामाद के लिए सबकुछ कर सकता है, जो लोग अपनी पैरवी उस तक करवा सकता है, उनके लिए सबकुछ कर सकता है... और यहाँ हमारा कोई गॉड फ़ादर नहीं है, तो हमारी ज़रूरी, वाजिब माँगें वह पूरी नहीं करना चाहता... लगता है हम इस संस्था के लिए किसी अछूत सरीखे हो गए ...!' मिश्र कुमार अजय का ग़ुस्सा भी सातवें आसमान पर जा पहुँचा। वे जैसे क्रोध से कबाब हुए जा रहे थे। हालाँकि मेरे यह मित्र अक्सर शांत ही रहा करते थे। सच पूछिए, तो दफ़्तर का माहौल इन दिनों इतना विषाक्त हो गया था कि हम सचमुच अपने को अछूत ही महसूसने लगे थे... शायद उनसे भी बदतर स्थिति इस संवैधानिक संस्था ने हम सबकी कर दी थी! बस हम इस भरोसे यहाँ थे कि इस उच्च सदन की सबसे ऊँची कुर्सी पर सबसे ईमानदार आदमी बैठेगा, तो हमें हमारा हक़ मिल जाएगा।
मेहरबाँ, इन दिनों हर तरफ़ शराबबंदी पर बहसें छिड़ी हुई थीं। अब आपसे क्या छुपाना और कैसा छुपाना! हमारे चीफ़ मिनिस्टर साहब को भी यही लगने लगा है कि यह शराबबंदी ही अगले चुनाव में उन्हें फिर से चीफ़ मिनिस्टर की कुर्सी पर क़ब्ज़ा दिलवाएगी! ज़्यादा मुमकिन है कि इन्हें प्राइम मिनिस्टर की कुर्सी तक भी पहुँचवा दे, इसलिए कि इनमें पी एम बनने का मैटेरियल काफ़ी मात्रा में है! आप सब अख़बार पढ़ते ही होंगे... टी वी भी देखते होंगे। हमारे चीफ़ मिनिस्टर साहब अख़बारों में, टी वी चैनल्स पर काफ़ी उत्साहित हो-होकर आ रहे हैं अपनी शराबबंदी को लेकर! पूरा पुलिस प्रशासन इन दिनों बस इसी नेक काम में लगा हुआ है कि सूबे में हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे संगीन जुर्म होते हैं तो हों, बस शराब कोई पीता दिखाई न दे! चीफ़ मिनिस्टर साहब इन दिनों इन्हीं बातों से ख़ुश होते थे! मैं भी शराबबंदी के इस समय में अपना सीना ताने, गर्व और गौरव के साथ दफ़्तर की सारी चिंताओं को लतियाते-जुतियाते अपने घर वापस लौटा, तो मोहल्ले के माहौल में हंगामा-सा फैला हुआ पाया, पूरी लज़्ज़त के साथ। घर दाख़िल हुआ, तो पत्नी का पुरज़ोर इस्तक़बाल पाकर मन गदगद हो उठा- 'क्या बात है बेगम, आज आप कुछ अलग ही दिखाई दे रही हैं?'
'मज़ाक़ करना छोड़िए फ़ैज़ के पापा, आपको मालूम नहीं, आज मोहल्ले में क्या हुआ?' पत्नी का चेहरा रहस्मयी-सा हो गया था।
'क्या हुआ, बिलआख़िर अली इंसान की बीवी किसी और के मर्द के साथ भाग गई... ऐसा तो एक-न-एक दिन होना ही था!'
'नहीं फ़ैज़ के पापा, बात यह नहीं है...'
'तो बात क्या है, बेगम?' मैंने पत्नी को आगे कुछ कहने से पहले ही टोका।
'ऊँह! आप बात पूरी सुनते ही नहीं!' पत्नी ने ज़रा-सा नाराज़ होते हुए एकदम राज़दाराना अंदाज़ में कहा-' मो. इस्लाम भाई फिर से शराब पीकर आए थे!'
'ऐसा हो ही नहीं सकता, फ़ैज़ की मम्मी!' मैंने पूरे एतेमाद से कहा- 'इतना सख़्त क़ानून अपने बिहार में लागू हो गया है कि शराब कहीं मिल ही नहीं सकती... मो. इस्लाम साहब ने ताड़ी पी ली होगी!'
'नहीं, उन्होंने शराब ही पी रखी थी और पूरे मुहल्ले में कहते फिर रहे थे कि एक शराबी को शराब पीने से कोई रोक नहीं सकता, क़ानून भी नहीं...'
मैंने पत्नी ने आगे क्या कहा, सुने बग़ैर मो. इस्लाम के घर जाना ज़रूरी समझा। उनके घर पहुँचा, तो वे नशे में थे। पत्नी और बच्चे डरे-सहमे एक तरफ़ पड़े थे। मुझे अचानक आया देखकर मो. इस्लाम की बीवी सकुचा गई थीं। मैंने बिना किसी हीला-हवाला के मो. इस्लाम से सवाल किया- 'इस्लाम भाई, सुबह मेरे ऑफ़िस जाने तक आप बिना नशे के आप कितने स्मार्ट लग रहे थे, फिर से शराब आपको कहाँ से मिल गई, किसने पीला दी आपको?'
मेरे सवाल पर मो. इस्लाम ज़रा भी नहीं चौंके, बस बड़बड़ाने-बुदबुदाने जे स्वर में कहे जा रहे थे- 'थाना इंचार्ज को शराब बेचने वालों से पैसे ज़्यादा चाहिए... उन्हें पैसे ज़्यादा चाहिए... तो शराब मुहैया होने
में कोई परेशानी नहीं होगी... हिच्... हिच्... हिच...'
मो. इस्लाम की यह हालत देखकर मेरे मन में आया कि अभी थाने जाकर 'थानेदार मुर्दाबाद' के नारे लगा ही दूँ, जो होगा देखा जाएगा। तभी मेरे भीतर एक बार फिर कबीर साहब प्रकट हुए, जो फिर-फिर गाए जा रहे थे : जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध / अंधे अंधा ठेलिया, दूनू कूप पड़ंत।
में कोई परेशानी नहीं होगी... हिच्... हिच्... हिच...'
मो. इस्लाम की यह हालत देखकर मेरे मन में आया कि अभी थाने जाकर 'थानेदार मुर्दाबाद' के नारे लगा ही दूँ, जो होगा देखा जाएगा। तभी मेरे भीतर एक बार फिर कबीर साहब प्रकट हुए, जो फिर-फिर गाए जा रहे थे : जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध / अंधे अंधा ठेलिया, दूनू कूप पड़ंत।
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