पुस्तक-समीक्षा- 'तो ग़लत क्या है' (अनिरुद्ध सिन्हा) : आदमी की दुनिया को विस्तार देती ग़ज़लें
● शहंशाह आलम/ समकालीन हिंदी साहित्य में ग़ज़ल का प्रभाव बढ़ा है, क़द बढ़ा है, स्वीकृति का दायरा बढ़ा है। ग़ज़ल के लिए इस सर्वव्यापकता के पीछे जिन महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों का सद्प्रयास रहा है, उनमें समकालीन ग़ज़ल के चर्चित शायर अनिरुद्ध सिन्हा की भूमिका जानीबूझी हुई है। इसलिए कि ग़ज़ल से अनिरुद्ध सिन्हा की जानपहिचान बेहद पुरानी है। यही वजह कि अनिरुद्ध सिन्हा का तत्काल आया ग़ज़ल-संग्रह 'तो ग़लत क्या है' की ग़ज़लें अज्ञात-अनजान नहीं लगती हैं। यहाँ एक बात और जोड़ता चलूँ कि पैसे वाले शायर लोग अकसर मैलेकुचैले आदमियों का परित्याग करते हुए आगे बढ़ते दिखाई दे जाते हैं। अनिरुद्ध सिन्हा ऐसा नहीं करते। इनके यहाँ यानी इनकी ग़ज़लों में आम आदमी को उतना ही सम्मान मिलता है, जितना सम्मान ये अपनी माशूक़ा को देते रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लें जितनी इश्किया हैं, उतनी ही प्रगतिशील चेतना से लैस भी हैं। यह तलवार की धार पर चलने जैसा मेरी नज़र में है कि एक शायर इश्क में भी मुब्तला है और आम आदमी की लड़ाइयाँ भी पूरी सफलता से लड़ रहा है। यह भी सच है कि कोई कवि, कोई शायर तलवार की धार पर चल नहीं पाए, तो फिर वह काहे का कवि और काहे का शायर :
आपसे और न ग़ैरों से गिला रहता है
दर्द की धूप में साया भी ख़फ़ा रहता है
नींद इस सोच से आई न कभी भी मुझको
ख़्वाब आँखों की सियासत से जुदा रहता है
बात अपनी मैं कोई तुझसे कहूँ तो कैसे
तेरे भीतर भी तो कोई और छुपा रहता है
जो कि सहरा में चले धूप लिए पलकों पर
सर्द रुत में भी वही तनके खड़ा रहता है
फ़र्क़ क्या है कि मैं नज़रों से हटा लूँ दर्पण
मेरे आँसू को मगर ग़म का पता रहता है (ग़ज़ल : एक/पृ.5)।
अनिरुद्ध सिन्हा की अधिकतर ग़ज़लें दिन के उजाले में लिखी गई हैं। यही वजह है कि इनकी ग़ज़लों में रात का गहरा एकांत या रात की आवाजाही ज़रा कम है। दुनिया की, इस दुनिया के लोगों की बेहतरी के लिए यह ज़रूरी है कि रचनाकार रात का अँधेरा छोड़कर दिन के उजाले को पकड़े। अब अँधेरे का सारा कारोबार दिन में पूरी बेईमानी से किया जा रहा है। बेईमानी का यह कारोबार जब व्यवस्थाजनित हो, पूँजीवादी हो, पुलिस वालों, चोर-उचक्कों, पॉकेटमारों द्वारा दिन के उजाले में सरेआम किया जा रहा हो, तो इंसाफ़ आप किनसे माँगेंगे । ये सरकारें, पूँजीपति, पुलिस, चोर-उचक्के, पॉकेटमार सब जान-समझ गए हैं कि दिन का किया सारा नाजायज़ जायज़ में शामिल होता आया है। इसीलिए अब ज़रूरी यही है कि सारे रचनाधर्मी रात का दामन छोड़कर धूप का दामन पकड़ें। अनिरुद्ध सिन्हा संभवत: रात के अँधियारे को इसीलिए छोड़कर धूप की ग़ज़लें लिखा करते हैं और धूप में की जा रही बेईमानी प्रकट करते दिखाई देते हैं :
भरोसे की नहीं दे और कुछ सौग़ात मुझको
परेशाँ कर रहे हैं ख़ुद मेरे हालात मुझको
ख़फ़ा जब से हुए हैं चाँद, सूरज और तारे
बहुत ख़ुद्दार-सी लगने लगी है रात मुझको
कई हिस्सों में बँट जाने से अक्सर रोकते हैं
दरो-दीवार, आँगन, हौसला, जज़्बात मुझको
मेरा ही अक्स तो मेरी नज़र का आइना है
बता देता है हरदम ये मेरी औक़ात मुझको
कई ज़ख़्मों के टाँके हैं अभीतक दिल में मेरे
मुहब्बत की नहीं लगती है अच्छी बात मुझको (ग़ज़ल : छ:/पृ.)।
अपने इस सद्य: प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह 'तो ग़लत क्या है' की ग़ज़लों में अनिरुद्ध सिन्हा कई-कई बार नए अवतार में दिखाई देते हैं। इस संग्रह में ग़ज़लों का बासीपन न के बराबर है। इनका अनुभव भी इनके पाठकों पर सिर चढ़कर बोलता है। अनिरुद्ध सिन्हा का यथार्थवादी नज़रिया भी पहले से ज़्यादा स्पष्ट, पहले से ज़्यादा आंदोलित करता दिखता है। यह किसी भी रचनाकार के विकास के लिए अच्छा है कि वह सिर्फ़ पीले फूलों में न उलझकर टहटह लाल फूलों को भी अपने जीवन का हिस्सा मानता है। इस पीले और लाल रंग का अर्थ हर जीवंत, हर सजग, हर जनता के उत्तरदायित्व को समझने वाला रचनाकार बख़ूबी जानता भी है, समझता भी है, रचनाओं में बरतता भी है। क्योंकि रचना-प्रक्रिया का सेतु सामाजिक-प्रक्रिया के मेल से ही तैयार होता रहा है। सृजन का लोक भी ऐसे ही बनता है। अनिरुद्ध सिन्हा ऐसे मामले में हमेशा जागरूक रहे हैं। 'तो ग़लत क्या है' का अर्थ भी मेरे विचार से अनिरुद्ध सिन्हा का यही है कि शायर वर्तमान के संकटों पर चोट करता है, तो यही सही करता है। इसलिए कि कोई रचनाकार कब तक अपने आसपास उग रही खरपतवार और घास-पात को रोगमुक्त वनस्पतियाँ मानकर सत्ता की चाकरी में लगा रहेगा :
राहों की मुश्किलों में कभी जो फिसल गए
इस हादसे के बाद वो कितने सँभल गए
कितना था बेक़रार समुंदर का इश्क़ भी
लहरों को देख-देख के हम भी मचल गए
निकला कभी जो दूर मुहब्बत की राह में
अपनों की बेरुख़ी से इरादे बदल गए
ऐसा असर हुआ है सियासत के खेल में
सपनों के जो सवाल थे वादों में ढल गए
हम दूसरों के सामने बौने बने रहे
साये हमारे धूप से आगे निकल गए (ग़ज़ल : छब्बीस/पृ.30)।
सच यही है, हम उत्सव मनाना चाहते भी हैं तो ज़िंदगी की परेशानियाँ आड़े आ जाती हैं। हम कलात्मक कुछ देना चाहते भी हैं तो सत्ता की मार से हमारी पीठ इतनी दाग़दार हो चुकी रहती है कि हमारी आह ही सामने आ जाती है। अब इसी से अंदाज़ा लगाइए कि उनका क्या हश्र होगा, जो बेचारे दिन-रात मेहनत-मशक्कत करके कमाते हैं और पूँजी का बाज़ार है कि मेहनत से उनके कमाए का मुँह चिढ़ाता है। पूँजीवाद का यह चिढ़ाना पूरी मनुष्य-जाति को चिढ़ाने जैसा है। मनुष्यता की रक्षा इन पूँजीवादियों से कैसे की जाए, यह विश्व समुदाय की चिंता बनकर खड़ी है। इसीलिए मेरा बार-बार रचनाकर्मियों से आग्रह रहता है कि विश्व के समक्ष आम आदमियों की जो चुनौतियाँ हैं, हमारी लड़ाई उन चुनौतियों से होनी चाहिए। इसलिए कि कोई भी सरकारें पूँजीपतियों को ख़त्म करने की बात नहीं करतीं, हमें ख़त्म करने के रोज़ नए तरीक़े ज़रूर निकालती रहती हैं। स्वाभाविक है कि अनिरुद्ध सिन्हा भी मनुष्य-जाति के शत्रुओं का विरोध करते हैं : 'फिर समुंदर में हवाएँ तेज़ हैं/ टूट जाएँगे किनारे आज भी', 'समय के चाँद पे ये जो नक़ाब है साहब/ किसी ग़रीब के ग़म की किताब है साहब', 'सितम का याद आना क्या सितम का भूल जाना क्या/ हुआ तय जुर्म उनका तो कई मौसम निकल जाए', 'पुराने तानाशाहों से बने जो ख़ून के धब्बे/ बदलते वक़्त का रुख़ भी उन्हें धोने नहीं देता', 'शर्त यह है सवाल रहने दो/ कल के क़िस्से का हाल रहने दो', 'देश बदला है जिस तरीक़े से/ अब नया संविधान आएगा', 'लाश पर फेंकने कफ़न केवल/ न्याय फिर बेज़ुबान आएगा।'
अनिरुद्ध सिन्हा मनुष्यता के शत्रुओं पर अपनी खोजी दृष्टि लगातार रखते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। इनके विचार स्पष्ट हैं। इनकी संचेतना समय को पकड़कर चलने वाली है। इनकी कामना सच को पुनर्स्थापित करने वाली है। सत्ता पक्ष और पूँजीवाद का जो स्वाँग रचा जा रहा, उसका पर्दाफ़ाश करने का साहस भी है। और यह अनिरुद्ध सिन्हा की शायरी के पाठकों/श्रोताओं के लिए सुखकर है। दुनिया से अँधेरा ऐसे ही रचनाकारों की रचनाओं से भागेगा। इतना भरोसा मुझे भी है। बस थोड़ी-बहुत चूक जो हमसे ज़्यादा चाह रखने से होती रही है। थोड़ा ध्यान इस ओर भी हम देने लगें तो सोने पे सुहागा जैसा हो जाए। दुनिया को बदलने के लिए, दुनिया को शोषकवर्ग से मुक्त करने के लिए, दुनिया को आतंकवाद से बचाने के लिए यह ज़रूरी भी है कि हमारी क़लम आग और लोहा उगले :
ये मेरे ख़्वाब हैं लो हिफ़ाज़त करो
तुम बड़े लोग हो कुछ सियासत करो
मुझको हर हाल में टूटना ही तो है
मैं खिलौना हूँ मुझसे शरारत करो
बेवफ़ाओं के सिर पे भी साया रहे
तुम वफ़ा की वो ऊँची इमारत करो
अपने-अपने नज़रिए पे क़ायम रहो
मैं मुहब्बत करूँ तुम अदावत करो
ख़ुशबुओं को बिखरने की आदत-सी है
तुम जो चाहो हवा से शिकायत करो (ग़ज़ल : सतासी/पृ.91)।
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तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)/ ग़ज़लकार : अनिरुद्ध सिन्हा/ प्रकाशक : मीनाक्षी प्रकाशन, एम बी 32/2बी, गली नंबर 2, शकरपुर, दिल्ली-110 092/ मोबाइल : 09430450098/ मूल्य : 150
समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, कमरा संख्या : 17, प्रथम तल, उपभवन, बिहार विधान परिषद, पटना-800 015/ मोबाइल : 09835417537
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आपसे और न ग़ैरों से गिला रहता है
दर्द की धूप में साया भी ख़फ़ा रहता है
नींद इस सोच से आई न कभी भी मुझको
ख़्वाब आँखों की सियासत से जुदा रहता है
बात अपनी मैं कोई तुझसे कहूँ तो कैसे
तेरे भीतर भी तो कोई और छुपा रहता है
जो कि सहरा में चले धूप लिए पलकों पर
सर्द रुत में भी वही तनके खड़ा रहता है
फ़र्क़ क्या है कि मैं नज़रों से हटा लूँ दर्पण
मेरे आँसू को मगर ग़म का पता रहता है (ग़ज़ल : एक/पृ.5)।
अनिरुद्ध सिन्हा की अधिकतर ग़ज़लें दिन के उजाले में लिखी गई हैं। यही वजह है कि इनकी ग़ज़लों में रात का गहरा एकांत या रात की आवाजाही ज़रा कम है। दुनिया की, इस दुनिया के लोगों की बेहतरी के लिए यह ज़रूरी है कि रचनाकार रात का अँधेरा छोड़कर दिन के उजाले को पकड़े। अब अँधेरे का सारा कारोबार दिन में पूरी बेईमानी से किया जा रहा है। बेईमानी का यह कारोबार जब व्यवस्थाजनित हो, पूँजीवादी हो, पुलिस वालों, चोर-उचक्कों, पॉकेटमारों द्वारा दिन के उजाले में सरेआम किया जा रहा हो, तो इंसाफ़ आप किनसे माँगेंगे । ये सरकारें, पूँजीपति, पुलिस, चोर-उचक्के, पॉकेटमार सब जान-समझ गए हैं कि दिन का किया सारा नाजायज़ जायज़ में शामिल होता आया है। इसीलिए अब ज़रूरी यही है कि सारे रचनाधर्मी रात का दामन छोड़कर धूप का दामन पकड़ें। अनिरुद्ध सिन्हा संभवत: रात के अँधियारे को इसीलिए छोड़कर धूप की ग़ज़लें लिखा करते हैं और धूप में की जा रही बेईमानी प्रकट करते दिखाई देते हैं :
भरोसे की नहीं दे और कुछ सौग़ात मुझको
परेशाँ कर रहे हैं ख़ुद मेरे हालात मुझको
ख़फ़ा जब से हुए हैं चाँद, सूरज और तारे
बहुत ख़ुद्दार-सी लगने लगी है रात मुझको
कई हिस्सों में बँट जाने से अक्सर रोकते हैं
दरो-दीवार, आँगन, हौसला, जज़्बात मुझको
मेरा ही अक्स तो मेरी नज़र का आइना है
बता देता है हरदम ये मेरी औक़ात मुझको
कई ज़ख़्मों के टाँके हैं अभीतक दिल में मेरे
मुहब्बत की नहीं लगती है अच्छी बात मुझको (ग़ज़ल : छ:/पृ.)।
अपने इस सद्य: प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह 'तो ग़लत क्या है' की ग़ज़लों में अनिरुद्ध सिन्हा कई-कई बार नए अवतार में दिखाई देते हैं। इस संग्रह में ग़ज़लों का बासीपन न के बराबर है। इनका अनुभव भी इनके पाठकों पर सिर चढ़कर बोलता है। अनिरुद्ध सिन्हा का यथार्थवादी नज़रिया भी पहले से ज़्यादा स्पष्ट, पहले से ज़्यादा आंदोलित करता दिखता है। यह किसी भी रचनाकार के विकास के लिए अच्छा है कि वह सिर्फ़ पीले फूलों में न उलझकर टहटह लाल फूलों को भी अपने जीवन का हिस्सा मानता है। इस पीले और लाल रंग का अर्थ हर जीवंत, हर सजग, हर जनता के उत्तरदायित्व को समझने वाला रचनाकार बख़ूबी जानता भी है, समझता भी है, रचनाओं में बरतता भी है। क्योंकि रचना-प्रक्रिया का सेतु सामाजिक-प्रक्रिया के मेल से ही तैयार होता रहा है। सृजन का लोक भी ऐसे ही बनता है। अनिरुद्ध सिन्हा ऐसे मामले में हमेशा जागरूक रहे हैं। 'तो ग़लत क्या है' का अर्थ भी मेरे विचार से अनिरुद्ध सिन्हा का यही है कि शायर वर्तमान के संकटों पर चोट करता है, तो यही सही करता है। इसलिए कि कोई रचनाकार कब तक अपने आसपास उग रही खरपतवार और घास-पात को रोगमुक्त वनस्पतियाँ मानकर सत्ता की चाकरी में लगा रहेगा :
राहों की मुश्किलों में कभी जो फिसल गए
इस हादसे के बाद वो कितने सँभल गए
कितना था बेक़रार समुंदर का इश्क़ भी
लहरों को देख-देख के हम भी मचल गए
निकला कभी जो दूर मुहब्बत की राह में
अपनों की बेरुख़ी से इरादे बदल गए
ऐसा असर हुआ है सियासत के खेल में
सपनों के जो सवाल थे वादों में ढल गए
हम दूसरों के सामने बौने बने रहे
साये हमारे धूप से आगे निकल गए (ग़ज़ल : छब्बीस/पृ.30)।
सच यही है, हम उत्सव मनाना चाहते भी हैं तो ज़िंदगी की परेशानियाँ आड़े आ जाती हैं। हम कलात्मक कुछ देना चाहते भी हैं तो सत्ता की मार से हमारी पीठ इतनी दाग़दार हो चुकी रहती है कि हमारी आह ही सामने आ जाती है। अब इसी से अंदाज़ा लगाइए कि उनका क्या हश्र होगा, जो बेचारे दिन-रात मेहनत-मशक्कत करके कमाते हैं और पूँजी का बाज़ार है कि मेहनत से उनके कमाए का मुँह चिढ़ाता है। पूँजीवाद का यह चिढ़ाना पूरी मनुष्य-जाति को चिढ़ाने जैसा है। मनुष्यता की रक्षा इन पूँजीवादियों से कैसे की जाए, यह विश्व समुदाय की चिंता बनकर खड़ी है। इसीलिए मेरा बार-बार रचनाकर्मियों से आग्रह रहता है कि विश्व के समक्ष आम आदमियों की जो चुनौतियाँ हैं, हमारी लड़ाई उन चुनौतियों से होनी चाहिए। इसलिए कि कोई भी सरकारें पूँजीपतियों को ख़त्म करने की बात नहीं करतीं, हमें ख़त्म करने के रोज़ नए तरीक़े ज़रूर निकालती रहती हैं। स्वाभाविक है कि अनिरुद्ध सिन्हा भी मनुष्य-जाति के शत्रुओं का विरोध करते हैं : 'फिर समुंदर में हवाएँ तेज़ हैं/ टूट जाएँगे किनारे आज भी', 'समय के चाँद पे ये जो नक़ाब है साहब/ किसी ग़रीब के ग़म की किताब है साहब', 'सितम का याद आना क्या सितम का भूल जाना क्या/ हुआ तय जुर्म उनका तो कई मौसम निकल जाए', 'पुराने तानाशाहों से बने जो ख़ून के धब्बे/ बदलते वक़्त का रुख़ भी उन्हें धोने नहीं देता', 'शर्त यह है सवाल रहने दो/ कल के क़िस्से का हाल रहने दो', 'देश बदला है जिस तरीक़े से/ अब नया संविधान आएगा', 'लाश पर फेंकने कफ़न केवल/ न्याय फिर बेज़ुबान आएगा।'
अनिरुद्ध सिन्हा मनुष्यता के शत्रुओं पर अपनी खोजी दृष्टि लगातार रखते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। इनके विचार स्पष्ट हैं। इनकी संचेतना समय को पकड़कर चलने वाली है। इनकी कामना सच को पुनर्स्थापित करने वाली है। सत्ता पक्ष और पूँजीवाद का जो स्वाँग रचा जा रहा, उसका पर्दाफ़ाश करने का साहस भी है। और यह अनिरुद्ध सिन्हा की शायरी के पाठकों/श्रोताओं के लिए सुखकर है। दुनिया से अँधेरा ऐसे ही रचनाकारों की रचनाओं से भागेगा। इतना भरोसा मुझे भी है। बस थोड़ी-बहुत चूक जो हमसे ज़्यादा चाह रखने से होती रही है। थोड़ा ध्यान इस ओर भी हम देने लगें तो सोने पे सुहागा जैसा हो जाए। दुनिया को बदलने के लिए, दुनिया को शोषकवर्ग से मुक्त करने के लिए, दुनिया को आतंकवाद से बचाने के लिए यह ज़रूरी भी है कि हमारी क़लम आग और लोहा उगले :
ये मेरे ख़्वाब हैं लो हिफ़ाज़त करो
तुम बड़े लोग हो कुछ सियासत करो
मुझको हर हाल में टूटना ही तो है
मैं खिलौना हूँ मुझसे शरारत करो
बेवफ़ाओं के सिर पे भी साया रहे
तुम वफ़ा की वो ऊँची इमारत करो
अपने-अपने नज़रिए पे क़ायम रहो
मैं मुहब्बत करूँ तुम अदावत करो
ख़ुशबुओं को बिखरने की आदत-सी है
तुम जो चाहो हवा से शिकायत करो (ग़ज़ल : सतासी/पृ.91)।
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तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)/ ग़ज़लकार : अनिरुद्ध सिन्हा/ प्रकाशक : मीनाक्षी प्रकाशन, एम बी 32/2बी, गली नंबर 2, शकरपुर, दिल्ली-110 092/ मोबाइल : 09430450098/ मूल्य : 150
समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, कमरा संख्या : 17, प्रथम तल, उपभवन, बिहार विधान परिषद, पटना-800 015/ मोबाइल : 09835417537
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