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विलुप्त हो गया मेरा गाँव

    -भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
मैं सोच रहा था
चलो अपना गाँव तलाशें।
फोरलेन, सीधी सड़क से होते हुए
गाँव कब पहुँच गया
पता ही नहीं चला।
न पगडण्डी, न हरे-भरे खेत,
न पीपल की छांव,
न बाग, न बगीचे............
यही नहीं-
न पनघट, न पनिहारन
और न भौजी व काकी
किसी को न पाकर लगा कि-
किसी अनजाने शहर में
आ गया हूँ।
देश ने कितनी तरक्की कर ली है
गाँव जाकर पता चला।
जहाँ हरियाली की जगह
ईंट-भट्ठों की
चिमनियों से निकलने वाले
धुएँ ने अपना
साम्राज्य फैला रखा है।
लघु उद्योगों ने गाँव के
छप्पर व खपरैल को
कंक्रीट के जंगल में तब्दील
कर दिया है।
अब गाँव- गाँव न रहकर
मिनी शहर बन गया है।    
छप्परों व खपरैलों ने
कोठे का रूप
अख्तियार कर लिया है
जहाँ घुँघुरूओं की झनकार
और ढोल-तबले की
थापों के साथ
मस्ती में डूबे लोगों की
खिलखिलाहटें
सुनाई पड़ती है।
पता चला कि-
इस कृत्य की मुखिया
हमारे बचपन की भौजाइयाँ हैं
और उनकी टीम मंे
गाँव की वे युवतियाँ हैं
जिनके माँ-बाप
आर्थिक तंगी और नशाखोरी
के चलते उनकी जरूरतें
पूरी करने में अक्षम हैं।
आधुनिक बनने की होड़ में
आर्थिक रूप से तंग
ये नव युवतियाँ
ऐसा घृणित कार्य करके
धनोपार्जन कर रही हैं।
शायद इसे ही
सेक्स रैकेट कहते हैं।
गाँव में लोगों की बातें सुनकर
हर समझदार
महसूस कर सकता है कि-
ये लोग
अशिक्षित हैं।
इनमें शिक्षा का अभाव है
इसीलिए ये लोग
अपनी धर्म/संस्कृति
को भूलने लगे हैं।
अब न तो खेत-खलिहान
और न ही चौपालों
में रौनक देखने को मिलती है।
सुबह से लेकर रात तक
दारू के अड्डे पर
एकत्र भीड़
और जाम से जाम टकराते लोग
किसान नहीं- धनवान बन गये हैं।
उनके घर-परिवार की
महिला सदस्य
सभीं स्वच्छन्द
हर उस कार्य को
अंजाम दे रहे हैं
जिसे अनैतिक कहा जाता है।
गाँव के लोगों का
मानना है कि-
महिलाओं द्वारा उक्त कार्य
पैसों के लिए
किया जा रहा है।
पहले के रिश्ते लोग
भूल चुके हैं।
यहाँ-
सब कुछ बेमानी
सा दिखता है।
मेरे गाँव को
पैसे वालों ने एक विशेष
गाँव का दर्जा दे रखा है।
जहाँ हर मौसम में
सफेदपोश, उनके प्रतिनिधि
और समर्थक
पयर्टन स्थल के रूप में
गाँव का सैर
कराते हैं।
गाँव के तथाकथित
सम्मानित लोग
वी.आई.पी. लोगों का
स्वागत-सत्कार कर
गौरवान्वित महसूस करते हैं।
कभी मुझ से
किसी ने कहा था कि-
60 वर्ष पूर्व वाला
हमारा वह गाँव
अब गाँव नहीं अपितु-
मॉडल गाँव
बन चुका है।
जहाँ के ताल-पोखरों के किनारे
बचे हुए बागों में
माननीयों की गाड़ियाँ
आती-जाती रहती हैं।
पूछा था- ऐसा क्यों?
तो उत्तर मिला था कि- ‘पैसा’
पैसा-
जिसको कमाने हेतु
हमारे गाँव के
अधिसंख्य लोग,
माननीयों व धन्ना सेठों के
लिए यहाँ भोग-विलास
जैसी हर सुख- सुविधा
मुहैय्या कराते हैं
जिन्हें- बड़े शहरों में
काफी धन खर्चने के बाद भी
हासिल नहीं किया जा सकता है।
यहाँ यह कहना कि-
ये माननीय सत्ता तक
अपनी पहुँच बनाने के लिए
धन खर्च करके
हमारे गाँव की
धर्म-संस्कृति का
विनाश कर रहे हैं।
मैं सन्न रह जाता हूँ
अन्दर ही अन्दर
अपने गाँव के बारे में
सोचना ही छोड़ देने का
प्रयास करता हूँ।
                 -भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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