तानाशाह का क़िला यानी एक अदद क़िस्सा-ए-अमेरिका
तानाशाह के घर की आज सबसे बड़ी ख़बर थी ध्वनित
कि मारा गया लादेन किसी अकेले मकान के एकांत हिस्से में
जिसे जन्म दिया था इसी तानाशाह ने और मारा भी था ख़ुद से
ख़बर पक्की थी इसलिए तानाशाह ख़ुश था अपने क़िले में
तन्मय था यश बटोरने में अपने अपयश को छिपाते हुए
तानाशाह का क़िला बड़ा था हमारे सपनों से भी बड़ा और भव्य
अनगिन तानाशाह समा सकते थे इस दुर्ग में अर्द्धनग्न पूर्णनग्न
तानाशाह का क़िला जादूकथाओं परिकथाओं से भरा होता था
जहाँ इच्छा ज़ाहिर करते ही चीज़ें हाज़िर हो जाती थीं ख़ून से सनीं
लेकिन तानाशाह तानाशाह होते हुए भी डरा रहता था अपनी मृत्यु से
इसी भय में वह रोता रहता था अपनी रातों के अँधरे में सबसे मुँह छिपाए
इसी भय से इस तानाशाह ने अपने क़िले के बाहर और भीतर भी
परमाणुशक्ति युद्धशक्ति कामशक्ति बढ़ाने के विज्ञापन लगा रखे थे चकाचक
पूरी दुनिया से भूख मिटाने का नुस्खा भी टंगवा रखा था अपने हरम में
किसी देश ने इस तानाशाह के बारे में इबारत-आराई कभी नहीं की
न इस तानाशाह के प्रेम के बारे में, जो इसे करना कभी नहीं आया
न इस तानाशाह द्वारा कराए गए मुखमैथुन के बारे में
न इस तानाशाह पर जूते फैंके जाने के बारे में
न इस तानाशाह के भोजन कपड़े-लत्ते पर ख़र्चे के बारे में
न इस तानाशाह के क़िले में दफ़्न लोगों के बारे में
यह तानाशाह किसी आदमख़ोर पशु की मानिंद था दुनिया के नक़्शे में
जो खाता रहता था अपने से कमज़ोर मुल्कों कमज़ोर शहरियों को
लादेन के मारे जाने के बाद तानाशाह के क़िले में हस्बे-मामूल
एक बड़ी सभा रखी गई थी जोकि क़तई विचित्र नहीं थी
इस सभा में विश्व भर के तानाशाह राष्ट्र आमंत्रित थे आनंदित
मगर इस भारी आयोजन में किसी मुल्क की कोई जनता नहीं बुलाई गई थी
न कोई कथाकार न कोई कवि न कोई आलोचक बुलाया गया था
हर तानाशाह ऐसा ही करता आया था सदियों-सदियों से
इन सब बातों को लेकर लेखक बिरादरी का और जनता का
रोना भी सकारण रोना था अलंकृत लच्छेदार शैली में
लेकिन लेखक बिरादरी अमूमन और अकसर यह भूल जाती थी
कि उनके रोने की योजना कभी सफल नहीं हुई किसी सरकार में
जनता तो जनता ही ठहरी किसी भी देश की
जनता अकसर दिन का धागा पकड़ना चाहती थी
अपने-अपने तानाशाह बादशाहों के भयों को भुलाकर
तब तक कुछ वेश्याएँ भिजवा दी जाती थीं
जनता का जी बहलाने और ललचाने और सिहराने
ख़ैर, भाई लोग! इस तानाशाही निरंतरता में इस तानाशाही ऋतुचक्र में
जनता अपने मुल्क की भी ऐसी ही हो गई है पूरी तरह
महँगाई की लात महँगाई का ख़ुशी-ख़ुशी जूता खानेवाली चुपचाप
इस महासभा में अपने मुल्क के भी नेता पहुँचे थे
मगर औरों की तरह वे भी सबसे बड़े तानाशाह का फोता ही सहलाते दिखे
एकदम अभ्यस्त एकदम रोमाँचित एकदम मँजे हुए इस कार्य में
ताकि उनका भी नाम विश्व पटल पर गूँजता रहे शब्दवत
फिर असलियत यह भी थी कि तानाशाह का फोता नहीं सहलानेवाले
तानाशाह के अंडकोश का मसाज नहीं करनेवाले मारे जा रहे थे
अमेरिकी एफ़ बी आई अमेरिकी सी आई ए के हाथों निर्ममता से
आज की तारीख़ में अमेरिकी ज्ञान अमेरिकी विज्ञान के अलावे
भारतीय ज्योतिष की लंपटई की कई-कई शाखाएँ
अपने अमेरिकापरस्त नेताओं की नाभि से निकलने लगी हैं
उनके द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुबह की दौड़ लगाते हुए
आपको आपके नेताओं के बारे यह सब सुन-जानकर बुरा लगा हो
तो चार झापड़ मार लें हत्या करवा दें फाँसी पर चढ़वा दें मेरी
मैं अपना पुराना स्कूटर रोके खड़ा हूँ इन्हीं राजमार्गों पर
या दादरी टाइप घटना के बहाने मेरे अब्बू को मरवा डालें
इसलिए कि चुनाव फिर नज़दीक है यानी हत्यारों का उत्सव क़रीब है
बॉस, मैं अकसर ग़लत नहीं कहता
और आप अकसर मुझसे नाराज़ हो जाते हैं
बॉस, मैं तो अमेरिका और अमेरिकी नीतियों का विरोध तब भी करूँगा
जब यहाँ की मीडिया उसकी कुनीतियों का समर्थन करेगी पुरज़ोर
इसलिए कि बॉस, यहाँ की मीडिया अमेरिका और अमेरिकी नीतियों का
विरोध करनेवालों को ही तानाशाह घोषित करती आई है लगातार
अपनी एक्सक्लूसिव ख़बरों को दिखाते हुए उत्साहित एकदम
ताकि जिस सरकार के ये चमचे हैं, वह सरकार ख़ुश रहे इनसे
तभी तो ज़्यादातर न्यूज़ चैनल सरकारी प्रवक्ता बने दिखाई देते हैं इन दिनों
जबकि बॉस, आपको तो दुनिया भर में बने और बसे
अमेरिकी सैनिक अड्डों के पैरोकारों की मुख़ालफ़त करनी चाहिए थी
मेरे भाई, सद्दाम हुसैन ने कर्नल गद्दाफ़ी ने अमेरिकी तानाशाही के ख़िलाफ़
अपना सिर ही तो उठाया था अपनी आँखें ही तो दिखाई थीं
बदले में अमेरिका ने उन्हें शहीद किया अपनी राक्षसी प्रवृति दिखाते हुए
बदले में एकदम खबरिया हमने भी तो उन्हें ही आतंकवादी घोषित किया
आप बहुत तेज़ हैं बॉस, आपकी इसी तेज़ी के कारण
हम भी तो मारे जाते रहे हैं अकसर सफ़दर हाशमी की तरह
तो कभी रोहित वेमुला की तरह तो कभी किसी एनकाउंटर के बहाने
आप बहुत तेज़ हैं बॉस, आप तानाशाह के क़िले में नतमस्तक
बस मल्टीनैशनल की बिकाऊ ज़बान बोलते हैं अपने दिन-रात में
हमारी सचबयानी पर परमाणु हथियार तानते हुए
यही विडंबना है हमारे बीत रहे गुज़र रहे समय की
हमने हमारी स्मृतियाँ तक बेच डाली हैं तानाशाह के हाथों
और हर तानाशाह देश औरत का सीना दाबकर
निकल ले रहा है अपने से बड़े तानाशाह के क़िले की बग़ल से।
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कि मारा गया लादेन किसी अकेले मकान के एकांत हिस्से में
जिसे जन्म दिया था इसी तानाशाह ने और मारा भी था ख़ुद से
ख़बर पक्की थी इसलिए तानाशाह ख़ुश था अपने क़िले में
तन्मय था यश बटोरने में अपने अपयश को छिपाते हुए
तानाशाह का क़िला बड़ा था हमारे सपनों से भी बड़ा और भव्य
अनगिन तानाशाह समा सकते थे इस दुर्ग में अर्द्धनग्न पूर्णनग्न
तानाशाह का क़िला जादूकथाओं परिकथाओं से भरा होता था
जहाँ इच्छा ज़ाहिर करते ही चीज़ें हाज़िर हो जाती थीं ख़ून से सनीं
लेकिन तानाशाह तानाशाह होते हुए भी डरा रहता था अपनी मृत्यु से
इसी भय में वह रोता रहता था अपनी रातों के अँधरे में सबसे मुँह छिपाए
इसी भय से इस तानाशाह ने अपने क़िले के बाहर और भीतर भी
परमाणुशक्ति युद्धशक्ति कामशक्ति बढ़ाने के विज्ञापन लगा रखे थे चकाचक
पूरी दुनिया से भूख मिटाने का नुस्खा भी टंगवा रखा था अपने हरम में
किसी देश ने इस तानाशाह के बारे में इबारत-आराई कभी नहीं की
न इस तानाशाह के प्रेम के बारे में, जो इसे करना कभी नहीं आया
न इस तानाशाह द्वारा कराए गए मुखमैथुन के बारे में
न इस तानाशाह पर जूते फैंके जाने के बारे में
न इस तानाशाह के भोजन कपड़े-लत्ते पर ख़र्चे के बारे में
न इस तानाशाह के क़िले में दफ़्न लोगों के बारे में
यह तानाशाह किसी आदमख़ोर पशु की मानिंद था दुनिया के नक़्शे में
जो खाता रहता था अपने से कमज़ोर मुल्कों कमज़ोर शहरियों को
लादेन के मारे जाने के बाद तानाशाह के क़िले में हस्बे-मामूल
एक बड़ी सभा रखी गई थी जोकि क़तई विचित्र नहीं थी
इस सभा में विश्व भर के तानाशाह राष्ट्र आमंत्रित थे आनंदित
मगर इस भारी आयोजन में किसी मुल्क की कोई जनता नहीं बुलाई गई थी
न कोई कथाकार न कोई कवि न कोई आलोचक बुलाया गया था
हर तानाशाह ऐसा ही करता आया था सदियों-सदियों से
इन सब बातों को लेकर लेखक बिरादरी का और जनता का
रोना भी सकारण रोना था अलंकृत लच्छेदार शैली में
लेकिन लेखक बिरादरी अमूमन और अकसर यह भूल जाती थी
कि उनके रोने की योजना कभी सफल नहीं हुई किसी सरकार में
जनता तो जनता ही ठहरी किसी भी देश की
जनता अकसर दिन का धागा पकड़ना चाहती थी
अपने-अपने तानाशाह बादशाहों के भयों को भुलाकर
तब तक कुछ वेश्याएँ भिजवा दी जाती थीं
जनता का जी बहलाने और ललचाने और सिहराने
ख़ैर, भाई लोग! इस तानाशाही निरंतरता में इस तानाशाही ऋतुचक्र में
जनता अपने मुल्क की भी ऐसी ही हो गई है पूरी तरह
महँगाई की लात महँगाई का ख़ुशी-ख़ुशी जूता खानेवाली चुपचाप
इस महासभा में अपने मुल्क के भी नेता पहुँचे थे
मगर औरों की तरह वे भी सबसे बड़े तानाशाह का फोता ही सहलाते दिखे
एकदम अभ्यस्त एकदम रोमाँचित एकदम मँजे हुए इस कार्य में
ताकि उनका भी नाम विश्व पटल पर गूँजता रहे शब्दवत
फिर असलियत यह भी थी कि तानाशाह का फोता नहीं सहलानेवाले
तानाशाह के अंडकोश का मसाज नहीं करनेवाले मारे जा रहे थे
अमेरिकी एफ़ बी आई अमेरिकी सी आई ए के हाथों निर्ममता से
आज की तारीख़ में अमेरिकी ज्ञान अमेरिकी विज्ञान के अलावे
भारतीय ज्योतिष की लंपटई की कई-कई शाखाएँ
अपने अमेरिकापरस्त नेताओं की नाभि से निकलने लगी हैं
उनके द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुबह की दौड़ लगाते हुए
आपको आपके नेताओं के बारे यह सब सुन-जानकर बुरा लगा हो
तो चार झापड़ मार लें हत्या करवा दें फाँसी पर चढ़वा दें मेरी
मैं अपना पुराना स्कूटर रोके खड़ा हूँ इन्हीं राजमार्गों पर
या दादरी टाइप घटना के बहाने मेरे अब्बू को मरवा डालें
इसलिए कि चुनाव फिर नज़दीक है यानी हत्यारों का उत्सव क़रीब है
बॉस, मैं अकसर ग़लत नहीं कहता
और आप अकसर मुझसे नाराज़ हो जाते हैं
बॉस, मैं तो अमेरिका और अमेरिकी नीतियों का विरोध तब भी करूँगा
जब यहाँ की मीडिया उसकी कुनीतियों का समर्थन करेगी पुरज़ोर
इसलिए कि बॉस, यहाँ की मीडिया अमेरिका और अमेरिकी नीतियों का
विरोध करनेवालों को ही तानाशाह घोषित करती आई है लगातार
अपनी एक्सक्लूसिव ख़बरों को दिखाते हुए उत्साहित एकदम
ताकि जिस सरकार के ये चमचे हैं, वह सरकार ख़ुश रहे इनसे
तभी तो ज़्यादातर न्यूज़ चैनल सरकारी प्रवक्ता बने दिखाई देते हैं इन दिनों
जबकि बॉस, आपको तो दुनिया भर में बने और बसे
अमेरिकी सैनिक अड्डों के पैरोकारों की मुख़ालफ़त करनी चाहिए थी
मेरे भाई, सद्दाम हुसैन ने कर्नल गद्दाफ़ी ने अमेरिकी तानाशाही के ख़िलाफ़
अपना सिर ही तो उठाया था अपनी आँखें ही तो दिखाई थीं
बदले में अमेरिका ने उन्हें शहीद किया अपनी राक्षसी प्रवृति दिखाते हुए
बदले में एकदम खबरिया हमने भी तो उन्हें ही आतंकवादी घोषित किया
आप बहुत तेज़ हैं बॉस, आपकी इसी तेज़ी के कारण
हम भी तो मारे जाते रहे हैं अकसर सफ़दर हाशमी की तरह
तो कभी रोहित वेमुला की तरह तो कभी किसी एनकाउंटर के बहाने
आप बहुत तेज़ हैं बॉस, आप तानाशाह के क़िले में नतमस्तक
बस मल्टीनैशनल की बिकाऊ ज़बान बोलते हैं अपने दिन-रात में
हमारी सचबयानी पर परमाणु हथियार तानते हुए
यही विडंबना है हमारे बीत रहे गुज़र रहे समय की
हमने हमारी स्मृतियाँ तक बेच डाली हैं तानाशाह के हाथों
और हर तानाशाह देश औरत का सीना दाबकर
निकल ले रहा है अपने से बड़े तानाशाह के क़िले की बग़ल से।
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● शहंशाह आलम


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