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ध्रुपद

    ध्रुपद ● शहंशाह आलम

देवता जब मेरा गुनाह आदिकालीन
सिद्ध करने में लगे होते हैं
मेरे अन्दर का ध्रुपदिया
देवताओं के विरुद्ध एक राग छेड़ता है

यह राग देवताओं के जनमने से ठीक पूर्व
जन्म ले चुका था हज़ार सदियों पहले

यही सच है मैं जब-जब
निढ़ाल हुआ हूँ थकन से
अपने न किए हुए
गुनाओं की फ़हरिस्त सुनकर-जानकर
ध्रुपद गायक बिना विचलन छेड़ता आया है
स्वर और लय मेरी थकान मिटाने के लिए

ध्रुपद गायक ऐसा बेसबब नहीं करते
जंगलों की तन्हाइयाँ भगाते हुए

उन्हें पता है कि देवता एक कवि को
नदी की तरह मुस्कराते देख नहीं सकते

हर देवता को यह पता रहता है
कि एक कवि मुस्कराकर-मुस्कराकर
इस धरती की उम्र बढ़ाता आया है हर बार

ध्रुपद गायक गाता है गाता ही जाता है
कवि के पक्ष में नदी के पक्ष में

देवता भागते हैं अपना चेहरा छुपाए
मेरे गुनाहों की फ़हरिस्त को फेंककर
जहाँ से वे भेजे गए थे हमेशा की तरह
मेरी कविता पर पाबंदी का फ़रमान लेकर।
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