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बोआई

मैं जो एक कवि हूँ देहाती इस बीहड़-विकट समय का
बोता हूँ यहाँ की ज़मीन में बीज उम्मीद से भर-भरकर
मन पर से दुःख के कठिनाई के भारी इस्पात को हटाते

आश्चर्य ज़मीन ने मुझे अन्न नहीं दिए बीजों के बदले
न मीठे फलों से भरे-लदे वृक्ष दिए अनगिन-असँख्य
न रोगमुक्त वनस्पतियाँ न हरी पत्तियाँ न लहराती घासें दीं

ज़मीन ने इस बोआई के बदले अस्त्र-शस्त्र दिए औज़ार दिए
अमीरों बलात्कारियों हत्यारों चोरों की इन सरकारों के विरुद्ध
जनता की भीड़ों के बीच निर्णायक लड़ाई का बिगुल बजाने।
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● शहंशाह आलम

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